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नज़्म
शिकवा
शर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीम
बू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
निसार मैं तेरी गलियों के
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
थीं बनात-उन-नाश-ए-गर्दुं दिन को पर्दे में निहाँ
शब को उन के जी में क्या आई कि उर्यां हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
बुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जा
न तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
इश्क़ में सर फोड़ना भी क्या कि ये बे-मेहर लोग
जू-ए-ख़ूँ को नाम दे देते हैं जू-ए-शीर का
अहमद फ़राज़
नज़्म
जिब्रईल-ओ-इबलीस
ख़िज़्र भी बे-दस्त-ओ-पा इल्यास भी बे-दस्त-ओ-पा
मेरे तूफ़ाँ यम-ब-यम दरिया-ब-दरिया जू-ब-जू
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
ज़िंदगानी की हक़ीक़त कोहकन के दिल से पूछ
जू-ए-शीर-ओ-तेशा-ओ-संग-ए-गराँ है ज़िंदगी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़ौक़ ओ शौक़
एेन-ए-विसाल में मुझे हौसला-ए-नज़र न था
गरचे बहाना-जू रही मेरी निगाह-ए-बे-अदब!
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
वो हीला-गर जो वफ़ा-जू भी है जफ़ा-ख़ू भी
किया भी 'फ़ैज़' तो किस बुत से दोस्ताना किया








