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नज़्म
वो सुब्ह कभी तो आएगी
अपने काले करतूतों पर जब ये दुनिया शरमाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
साहिर लुधियानवी
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ग़ज़ल
न हर्फ़-ए-हक़, न वो मंसूर की ज़बाँ, न वो दार
न कर्बला, न वो कटते सरों के नज़राने
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
ज़हे करिश्मा कि यूँ दे रक्खा है हम को फ़रेब
कि बिन कहे ही उन्हें सब ख़बर है क्या कहिए

