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ग़ज़ल
दिल को हुस्न-ए-ग़म-ए-जानाँ से फ़रोज़ाँ कर दें
कुफ़्र में रंग भरें ऐसा कि ईमाँ कर दें
मख़मूर भोपाली
ग़ज़ल
फिर हुजूम-ए-ग़म-ए-जानाँ है ख़ुदा ख़ैर करे
फिर मिरी मौत का सामाँ है ख़ुदा ख़ैर करे
मुख़्तार आशिक़ी जौनपुरी
ग़ज़ल
सब जिसे कहते हैं वक़्फ़-ए-ग़म-ए-जानाँ होना
अव्वलीं शर्त है उस के लिए इंसाँ होना
कैफ़ मुरादाबादी
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kaarvaa.n-gaah-e-jahaa.n
कारवाँ-गाह-ए-जहाँ کَارْوَاں گاہِ جَہاں
कारवां सरा, अस्थाई निवास
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ग़ज़ल
हरगिज़ न हो ऐ दिल ग़म-ए-जानाँ की शिकायत
करता है भला कोई भी मेहमाँ की शिकायत
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
ग़ज़ल
फ़साना-ए-ग़म-ए-जानाँ किसी पे बार नहीं
अब अपने दिल के सिवा कोई राज़दार नहीं
उस्ताद अज़मत हुसैन ख़ाँ
ग़ज़ल
ग़म-ए-जानाँ ग़म-ए-दौराँ बहुत हैं ग़म ज़माने में
मगर जो ग़म को अपनाए बहुत हैं कम ज़माने में
माहम शाह
ग़ज़ल
था जो अरमानों का डेरा आरज़ूओं का हसीं बसेरा
अब वो मकाँ आबाद नहीं है ऐ ग़म-ए-दुनिया ऐ ग़म-ए-जानाँ
अबरार आबिद
ग़ज़ल
थी मगर ऐ ग़म-ए-जानाँ कभी ऐसी तो न थी
ज़िंदगी ख़ुद से गुरेज़ाँ कभी ऐसी तो न थी
जलील नोमानी रामपुरी
ग़ज़ल
ज़िंदगी को ग़म-ए-जानाँ के हवाले कर दूँ
जिस का डर है उसी तूफ़ाँ के हवाले कर दूँ
उरूज ज़ैदी बदायूनी
ग़ज़ल
कुछ ग़म-ए-जानाँ कुछ ग़म-ए-दौराँ दोनों मेरी ज़ात के नाम
एक ग़ज़ल मंसूब है उस से एक ग़ज़ल हालात के नाम



