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नज़्म
ए'तिराफ़
जन्नत-ए-शौक़ थी बेगाना-ए-आफ़ात-ए-सुमूम
दर्द जब दर्द न हो काविश-ए-दरमाँ मालूम
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
फ़रार
मेरी उम्मीदों का हासिल मिरी काविश का सिला
एक बे-नाम अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
परछाइयाँ
उन्ही के साए में फिर आज दो धड़कते दिल
ख़मोश होंटों से कुछ कहने सुनने आए हैं
साहिर लुधियानवी
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ग़ज़ल
बयाँ क्या कीजिए बेदाद-ए-काविश-हा-ए-मिज़गाँ का
कि हर यक क़तरा-ए-ख़ूँ दाना है तस्बीह-ए-मरजाँ का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ये पीरान-ए-कलीसा-ओ-हरम ऐ वा-ए-मजबूरी
सिला इन की कद-ओ-काविश का है सीनों की बे-नूरी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ये मुशगाफ़ियाँ हैं गिराँ तब-ए-इश्क़ पर
किस को दिमाग़-ए-काविश-ए-ज़ात-ओ-सिफ़ात है









