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ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी

1932 - 1981 | ग़ाज़ीपुर, भारत

ग़ज़ल 1

 

शेर 3

नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी सकती है

उन की आग़ोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं

सब की नज़रों में हो साक़ी ये ज़रूरी है मगर

सब पे साक़ी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं

शैख़ करता तो है मस्जिद में ख़ुदा को सज्दे

उस के सज्दों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं

 

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