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ग़ज़ल
था दरबार-ए-कलाँ भी उस का नौबत-ख़ाना उस का था
थी मेरे दिल की जो रानी अमरोहे की रानी थी
जौन एलिया
नज़्म
ख़ुशामद
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है
मर्द ओ ज़न तिफ़्ल ओ जवाँ ख़ुर्द ओ कलाँ पीर ओ फ़क़ीर
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
हिलाल-ए-ईद
मस्जिदों में सब जम्अ' हो जाएँगे ख़ुर्द-ओ-कलाँ
दूर हो दिल की कुदूरत ये सवाल-ए-ईद है
निसार कुबरा अज़ीमाबादी
नज़्म
सलाम
'ताहिरा' सालगिरह आज है आज़ादी की
हिन्द के ख़ुर्द-ओ-कलाँ साथियों प्यारों को सलाम
बनो ताहिरा सईद
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ई-पुस्तक
कलाम
कलाम
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रेख़्ता शब्दकोश
kahaa.n
कहाँکَہاں
किधर, किस जगह, कब, एक प्रश्नवाचक अव्यय जिसका प्रयोग मुख्यतः स्थान के संबंध में जिज्ञासा या प्रश्न के प्रसंग में होता है
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ग़ज़ल
सब एक रंग में हैं मय-कदे के ख़ुर्द ओ कलाँ
यहाँ तफ़ावुत-ए-पीर-ओ-जवाँ नहीं होता
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मज्ज़ूब
नज़्म
15 अगस्त (1949)
हर ख़ुर्द-ओ-कलाँ हर पीर-ओ-जवाँ है आज निदा-ए-आज़ादी
ये कोशिश सब पर लाज़िम है दाइम हो बक़ा-ए-आज़ादी
अर्श मलसियानी
ग़ज़ल
शराब-ए-इश्क़ से मख़मूर सब ख़ुर्द-ओ-कलाँ होंगे
तुयूर-ए-बाग़-ए-उल्फ़त महव-ए-दीदार-ए-बुताँ होंगे











