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ग़ज़ल
तिरे मनचलों का जग में ये अजब चलन रहा है
न किसी की बात सुनना, न किसी से बात करना
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
था दरबार-ए-कलाँ भी उस का नौबत-ख़ाना उस का था
थी मेरे दिल की जो रानी अमरोहे की रानी थी
जौन एलिया
ग़ज़ल
फ़ना बुलंदशहरी
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ई-पुस्तक
कलाम
कलाम
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नज़्म
बंजारा-नामा
घर-बार अटारी चौपारी क्या ख़ासा नैन-सुख और मलमल
चलवन पर्दे फ़र्श नए क्या लाल पलंग और रंग-महल
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
उस्ताद-ए-मोहतरम को मेरा सलाम कहना
मुझ को ख़बर नहीं थी आया हूँ मैं कहाँ से
माँ बाप इस ज़मीं पर लाए थे आसमाँ से
अहमद हातिब सिद्दीक़ी
उद्धरण
जो मुल़्क जितना ग़ुर्बत-ज़दा होगा उतना ही आलू और मज़हब का चलन ज़्यादा होगा।...












