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ग़ज़ल
दिलों पर सैकड़ों सिक्के तिरे जोबन के बैठे हैं
कलेजों पर हज़ारों तीर इस चितवन के बैठे हैं
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
है मक़्सद ये कि लोगों के कलेजों को मिले ठंडक
मैं अपना दिल जलाने के बहाने ढूँड लेता हूँ
चन्द्र शेखर वर्मा
नज़्म
चढ़ा दिया है भगत-सिंह को रात फाँसी पर
चले हैं नावक-ए-बेदाद फिर कलेजों पर
कि आज उठ गए अफ़्सोस नौजवाँ रहबर
आफ़ताब रईस पानीपती
नज़्म
ऐब्स्ट्रैक्ट आर्ट
इस नुमाइश में जो अतफ़ाल चले आते थे
डर के माओं के कलेजों से लिपट जाते थे
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
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ग़ज़ल
बे-वफ़ा मान से आ हम बनू-हाशिम की तरफ़
हम ने बख़्शे हैं कलेजों को चबाने वाले
अब्दुल्लाह अली हाशमी
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
हो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न हो
चमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
कभी कभी
भटक रही है ख़लाओं में ज़िंदगी मेरी
इन्ही ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खो कर
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
कहीं चाक-ए-जाँ का रफ़ू नहीं किसी आस्तीं पे लहू नहीं
कि शहीद-ए-राह-ए-मलाल का नहीं ख़ूँ-बहा उसे भूल जा

