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शेर
अभी कम-सिन हो रहने दो कहीं खो दोगे दिल मेरा
तुम्हारे ही लिए रक्खा है ले लेना जवाँ हो कर
दाग़ देहलवी
शेर
जान जानी है मिरी ऐ बुत-ए-कम-सिन तुझ पर
मर ही जाऊँगा गला काट के इक दिन तुझ पर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
दिल मिरे सहरा-नवर्द-ए-पीर दिल
मुज़्तरिब लेकिन मुज़बज़ब तिफ़्ल-ए-कम-सिन की तरह
आग ज़ीना आग रंगों का ख़ज़ीना
नून मीम राशिद
नज़्म
काले सफ़ेद परों वाला परिंदा और मेरी एक शाम
चाय-ख़ानों नाच-घरों से कम-सिन लड़के
अपने हम-सिन माशूक़ों को
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
सत्तर माओं का प्यार
घर में किसी को भी ग़ुस्सा न आया
ये कम-सिन ज़ेहानत की तासीर थी
अली मोहम्मद फ़र्शी
ग़ज़ल
दुख़्तर-ए-रज़ की हूँ सोहबत का मुबाशिर क्यूँकर
अभी कम-सिन है बहुत मर्द से शरमाती है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
सीना-ए-ख़्वाब खुले
वो तज़ब्ज़ुब कि जिसे कम-सिन-ओ-कम-ख़्वाब निगाहों के भरोसे ने
गुलाब और चमेली की महक बख़्शी थी
अय्यूब ख़ावर
नज़्म
बदनाम हो रहा हूँ
कम-सिन हैं बे-ख़बर हैं उठती जवानियाँ हैं
क्या समझें ग़म के हाथों क्यूँ सर-गिरानियाँ हैं
अख़्तर शीरानी
शेर
दुख़्तर-ए-रज़ की हूँ सोहबत का मुबाशिर क्यूँ-कर
अभी कम-सिन है बहुत मर्द से शरमाती है



