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ग़ज़ल
पल दो पल का साथ है अब रौशनी का चल पड़ें
शाम है इक कतबा-ए-क़ब्र-ए-जवाँ खोले हुए
मुसव्विर सब्ज़वारी
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नज़्म
सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार
कुछ इस तरह से बढ़ा दिल में ज़ौक़-ए-आज़ादी
कि रफ़्ता रफ़्ता तमन्ना जवान होती गई
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
टीपू की आवाज़
फीका है जिस के सामने अक्स-ए-जमाल-ए-यार
अज़्म-ए-जवाँ को मैं ने वो ग़ाज़ा अता किया
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
हाँ तुम्हीं पर जान देता हूँ तुम्हीं पर हूँ निसार
हाँ तुम्हीं पर है तबी'अत टूट कर आई हुई
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
क़ब्र में सोएँगे आराम से अब ब'अद-ए-फ़ना
आएगा ख़्वाब-ए-अदम दीदा-ए-बेदार के पास
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
कुछ दिनों बैठो सर-ए-क़ब्र-ए-'अज़ीज़'-ए-बे-नवा
ख़ानक़ाहों में बहुत दुश्वार है कामिल बनो
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
क़ितआ
मुजरिम-ए-सरताबी-ए-हुस्न-ए-जवाँ हो जाइए
गुल-फ़िशानी ता-कुजा शोला-फ़िशाँ हो जाइए


