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शेर
लग़्ज़िश-ए-साक़ी-ए-मय-ख़ाना ख़ुदा ख़ैर करे
फिर न टूटे कोई पैमाना ख़ुदा ख़ैर करे
अब्दुल्लतीफ़ शौक़
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ग़ज़ल
साग़र में पड़ा 'अक्स-ए-रुख़-ए-साक़ी-ए-महवश
पैदा हुआ महताब में महताब का 'आलम
धर्मपाल गुप्ता वफ़ा देहलवी
ग़ज़ल
रंग है ऐ साक़ी-ए-सरशार क़ैसर-बाग़ में
फूल पीते हैं तिरे मय-ख़्वार क़ैसर-बाग़ में
वज़ीर अली सबा लखनवी
ग़ज़ल
उल्फ़त-ए-साक़ी-ए-महवश के तसव्वुर में शराब
आज साग़र में परी बन के उतर आई है
शिव चरन दास गोयल ज़ब्त
नअत
जिस को हासिल हैं ग़म-ए-साक़ी-ए-कौसर के मज़े
उस की तक़दीर में हैं रहमत-ए-दावर के मज़े






