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ग़ज़ल
नज़ीर अकबराबादी
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कुल्लियात
इन जलती हड्डियों को शायद हुमा न खावे
तब इश्क़ की हमारे पहुँची है उस्तुख़्वाँ तक
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
ये दिल काहे को तेरी याद में जल जल के धड़के है
ये काहे नाम ले तेरा ये क्यूँकर रोग है खावे
आफ़ताब शाह
कुल्लियात
तेग़ बुलंद हुई है उस की क़िस्मत होंगे ज़ख़्म-रसा
मर्द अगर है सैद-ए-हरम तो कोई जराहत खावे अब
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
क़ौल पर तेरे नहीं पैमाँ-शिकन कुछ ए'तिबार
हर घड़ी वा'दा करे या खावे तू सौगंद और
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
ग़ज़ल
कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइ'ज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले





