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ग़ज़ल
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
ख़बर की थी गुलिस्तान-ए-मोहब्बत में भी ख़तरे हैं
जहाँ गिरती है बिजली हम उसी डाली पे जा बैठे
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
दोस्तों के साथ चलने में भी ख़तरे हैं हज़ार
भूल जाता हूँ हमेशा मैं सँभल जाने के बा'द
आलम ख़ुर्शीद
नज़्म
ईस्ट इंडिया कंपनी के फ़रज़ंदों से ख़िताब
दस्त-कारों के अंगूठे काटते फिरते थे तुम
सर्द लाशों से गढों को पाटते फिरते थे तुम
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
बुलंदी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची 'इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है
मुनव्वर राना
शेर
ये माना इंक़लाब-ए-ज़िंदगी में लाख ख़तरे हैं
तमन्ना फिर भी है ये ज़िंदगी ज़ेर-ओ-ज़बर होती
फ़िराक़ गोरखपुरी
हिंदी ग़ज़ल
इधर इस्लाम ख़तरे में उधर है राम ख़तरे में
मगर मैं क्या करूँ है मेरी सुब्ह ओ शाम ख़तरे में








