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नज़्म
मुझे जाना है इक दिन
अभी तो हुस्न के पैरों पे है जब्र-ए-हिना-बंदी
अभी है इश्क़ पर आईन-ए-फ़र्सूदा की पाबंदी
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
याद आता है वो हर्फ़ों का उठाना अब तक
जीम के पेट में एक नुक्ता है और ख़ाली हे
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
हास्य
आज बस इतना बता दो कि है जज़्बात की रात
ख़ुद को तुम दिन के उजाले से बचाते क्यूँ हो
हिलाल सिवहारवी
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नज़्म
तज़मीन बर-अशआ'र-ए-ग़ालिब
है नज़र ख़ू-कर्दा-ए-अख़्तर-शुमारी हाए हाए
एक दिन वो भी था जब दम भर की फ़ुर्क़त थी मुहाल
ज़े ख़े शीन
नज़्म
पयाम
नहीं नहीं मुझे बर्दाश्त अब नहीं की नहीं
ख़ुदा के वास्ते कहना न अब की बार ''नहीं''
ज़े ख़े शीन
ग़ज़ल
अबरार आबिद
शायरी के अनुवाद
अकेला बैठा हुआ हूँ यहाँ चलती राह के किनारे
जो भोर के समय संगीत की नाव को खे कर दिलों के घाट पर ले आए




