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नज़्म
नौ-जवान ख़ातून से
सनानें खींच ली हैं सर-फिरे बाग़ी जवानों ने
तू सामान-ए-जराहत अब उठा लेती तो अच्छा था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मजबूरियाँ
हदें वो खींच रक्खी हैं हरम के पासबानों ने
कि बिन मुजरिम बने पैग़ाम भी पहुँचा नहीं सकता
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
असर है जज़्ब-ए-उल्फ़त में तो खिंच कर आ ही जाएँगे
हमें पर्वा नहीं हम से अगर वो तन के बैठे हैं
दाग़ देहलवी
नज़्म
मुफ़्लिसी
सूरत भी उस की देख के मुँह खिंच रहे परे
तस्वीर और नक़्श में क्या रंग वो भरे

