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नज़्म
याद
दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स ओ ख़ाक तले
खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
दोस्ती का हाथ
न तुम को अपने ख़द-ओ-ख़ाल ही नज़र आएँ
न मैं ये देख सकूँ जाम में भरा क्या है
अहमद फ़राज़
नज़्म
फ़रार
वो कँवल जिन को कभी उन के लिए खिलना था
उन की नज़रों से बहुत दूर भी खिल सकते हैं
साहिर लुधियानवी
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नज़्म
परछाइयाँ
कि आरज़ू के कँवल खिल के फूल हो जाएँ
दिल-ओ-नज़र की दुआएँ क़ुबूल हो जाएँ
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
ये बजा कली ने खिल कर किया गुलसिताँ मोअत्तर
अगर आप मुस्कुराते तो कुछ और बात होती


