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ग़ज़ल
ये खोटे सिक्के हैं अल्फ़ाज़ इस सदी की सुनो
ये इन का दौर नहीं ये तो इस जहाँ से गए
सादिक़ा नवाब सहर
नज़्म
वसिय्यत
कुछ अंधे सूरमा जो तीर अँधेरे में चलाते हैं
सदा दुश्मन का सीना ताकते ख़ुद ज़ख़्म खाते हैं
कैफ़ी आज़मी
ग़ज़ल
'आरज़ू' अब भी खोटे खरे को कर के अलग ही रख देंगी
उन की परख का क्या कहना है जो टेकसाली आँखें हैं
आरज़ू लखनवी
नज़्म
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सवा
अपने प्यारों को सभी रोज़ जहाँ खोते हैं
ऐसी दुनिया में जहाँ और भी ग़म होते हैं
सहर अलीग
ग़ज़ल
गिर गया अपनी निगाहों में ही अपना सब वक़ार
जब सर-ए-बाज़ार खोटे को खरा हम ने कहा
राजेन्द्र नाथ रहबर
ग़ज़ल
ख़ालिद अख़लाक़
ग़ज़ल
ख़ूब पहचान लिया हम ने तुम्हें दिल दे कर
सच कहा है कि जो खोते हैं वही पाते हैं
