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ग़ज़ल
काट कर दस्त-ए-दुआ को मेरे ख़ुश हो ले मगर
तू कहाँ आख़िर ये शाख़-ए-बे-समर ले जाएगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
जब हो दम-ए-आख़िर तो बचा लेने की ताक़त
फिर ख़ाक-ए-शिफ़ा में न कहीं आब-ए-बक़ा में
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
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ग़ज़ल
गर्द उड़ाई जो सियासत ने वो आख़िर धुल गई
अहल-ए-दिल की ख़ाक में भी ज़िंदगी पाई गई
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
जुनूँ ने 'आलम-ए-वहशत में जो राहें निकाली हैं
ख़िरद के कारवाँ आख़िर उन्ही राहों पे चलते हैं
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
इत्तिहादी
बस एक ख़ुत्बा-ए-ज़ैनब अली के लहजे में
यज़ीदियत की जड़ें दूर तक हिला दी हैं
नश्तर अमरोहवी
ग़ज़ल
नज़्म तबातबाई
ग़ज़ल
क्या मिस्ल-ए-चराग़-ए-शब-ए-आख़िर है जवानी
शिरयानों में इक ताज़ा तवानाई सी क्यूँ है
फ़ुज़ैल जाफ़री
ग़ज़ल
रफ़ीक़-ए-ज़िंदगी थी अब अनीस-ए-वक़्त-ए-आख़िर है
तिरा ऐ मौत हम ये दूसरा एहसान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
अव्वल ओ आख़िर फ़ना बातिन ओ ज़ाहिर फ़ना
नक़्श-ए-कुहन हो कि नौ मंज़िल-ए-आख़िर फ़ना
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये यक़ीं ये गुमाँ
ख़िरद की मंज़िल-ए-आख़िर बनाएँगे किस को
ख़िरद की मंज़िल-ए-आख़िर न मिल सकेगी कभी
दाऊद ग़ाज़ी
ग़ज़ल
उमीदें मिल गईं मिट्टी में दौर-ए-ज़ब्त-ए-आख़िर है
सदा-ए-ग़ैब बतला दे हमें हुक्म-ए-ख़ुदा क्या है