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ग़ज़ल
क्या मज़ा हो जो किसी से तुझे उल्फ़त हो जाए
जी कुढ़े फ़िक्र रहे मेरी सी हालत हो जाए
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
कुल्लियात
जिसे हो मर्ग सा पेश इस्तिहाला क्यों न कुढ़े
इस अपने जीने से कुछ इम्बिसात मुझ को नहीं
मीर तक़ी मीर
नज़्म
एक शौहर का तआ'रुफ़
कोई क्यों हम-जिंस के ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद पर कुढ़े
वर्ना रूदाद-ए-क़फ़स हम को सिरे से याद है
मंझू बेगम लखनवी
ग़ज़ल
हर जा के तिलिस्माना 'अदू साथ कुढ़े जा
इस रोज़ ज़ुबूँ हूँ जो मिरे मुँह में ज़बाँ है
अबान आसिफ़ कचकर
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ग़ज़ल
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
किस का काबा कैसा क़िबला कौन हरम है क्या एहराम
कूचे के उस के बाशिंदों ने सब को यहीं से सलाम किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
अब इस को कुफ़्र मानें या बुलंदी-ए-नज़र जानें
ख़ुदा-ए-दो-जहाँ को दे के हम इंसान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
इशक़-ए-पेचाँ की संदल पर जाने किस दिन बेल चढ़े
क्यारी में पानी ठहरा है दीवारों पर काई है
जौन एलिया
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
ख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू है
यक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इस बस्ती के इक कूचे में
इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना
इक नार पे जान को हार गया मशहूर है उस का अफ़साना
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
कूचे से तेरे उट्ठें तो फिर जाएँ हम कहाँ
बैठे हैं याँ तो दोनों जहाँ से उठा के हाथ