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ग़ज़ल
ग़ैर की बज़्म के मुहताज नहीं हम 'रासिख़'
शाद-ओ-आबाद रहे कुलबा-ए-अहज़ाँ अपना
मोहम्मद यूसुफ़ रासिख़
ग़ज़ल
वाह क्या कहना है तेरा ऐ ख़याल-ए-हुस्न-ए-यार
कुलबा-ए-तारीक में तू ने उजाला कर दिया
फ़ाज़िल काश्मीरी
ग़ज़ल
हो गया आज मिरा कुलबा-ए-अहज़ाँ रौशन
उन के आने से मकाँ रश्क-ए-फ़लक है कि नहीं
हैदर हुसैन फ़िज़ा लखनवी
ग़ज़ल
घर तू ने रक़ीबों का न ऐ आह जलाया
फिर क्या जो मिरे कुलबा-ए-इहजां में लगी आग
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
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नज़्म
चश्म-ए-बद-दूर
वो कुलबा-ए-तारीक यूँ पुर-नूर होता जा रहा था
मैं हर इक वहम-ओ-गुमाँ से दूर होता जा रहा था
शहराम सर्मदी
नज़्म
नवा-ए-सरोश
किसी के नौजवाँ अरमान मिट्टी में मिले होंगे
किसी के कुलबा-ए-अहज़ाँ में लाखों गुल खिले होंगे
बिसमिल देहलवी
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
थी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्या
अर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्या
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
ख़ाक-बर-सर चलो ख़ूँ-ब-दामाँ चलो
राह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
जब तुम से मोहब्बत की हम ने तब जा के कहीं ये राज़ खुला
मरने का सलीक़ा आते ही जीने का शुऊ'र आ जाता है
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
जौन एलिया
ग़ज़ल
ख़ुद-ब-ख़ुद नींद सी आँखों में घुली जाती है
महकी महकी है शब-ए-ग़म तिरे बालों की तरह
