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ग़ज़ल
गुलज़ार में जो दूर गुल-ए-लाला-रंग हो
वो बे-हिजाबियाँ हों कि नर्गिस भी दंग हो
लाला माधव राम जौहर
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
सुब्ह-दम बाद-ए-सबा की शोख़ियाँ काम आ गईं
लाला-ओ-गुल को बग़ल-गीरी का मौक़ा मिल गया
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
लाला-ए-गुल ने हमारी ख़ाक पर डाला है शोर
क्या क़यामत है मुओं को भी सताती है बहार