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नज़्म
मिरे हमदम मिरे दोस्त!
कैसे इक चेहरे के ठहरे हुए मानूस नुक़ूश
देखते देखते यक-लख़्त बदल जाते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
सुना है
दरख़्तों की घनी छाँव में जा कर लेट जाता है
हवा के तेज़ झोंके जब दरख़्तों को हिलाते हैं
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
एक ख़्वाब
फ़र्श पर लेट गई है तू कभी रूठ के मुझ से
और कभी फ़र्श से मुझ को भी उठाया है मना कर
गुलज़ार
नज़्म
जुगनू
रुकी रुकी दिल-ए-फ़ितरत की धड़कनें यक-लख़्त
ये रंग-ए-शाम कि गर्दिश ही आसमाँ में नहीं
