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ग़ज़ल
बहादुर शाह ज़फ़र
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शेर
महव-ए-लिक़ा जो हैं मलकूती-ख़िसाल हैं
बेदार हो के भी नज़र आते हैं ख़्वाब में
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल
पास उस के बना दीजो मिरी आँख भी नक़्क़ाश
गर खींचे है तू नक़्श-ए-रुख़ उस हूर-लिक़ा का
रासिख़ अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
शौक़-ए-लिक़ा-ए-रू-ए-यार चश्म-बराह-ए-इंतिज़ार
आह-ए-सहर से जा मिला दीदा-ए-अश्क-बार-ए-शब
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल
हमारा हुस्न-ए-तअल्लुक़ वफ़ा बने न बने
वो इश्वा-संज है फ़र्रूख़-लिक़ा बने न बने
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल
किसी यूसुफ़-लिक़ा की याद में रोया हूँ मैं इतना
गिराया सर पे सैल-ए-अश्क ने दीवार-ए-ज़िंदाँ को
नश्तर छपरावी
ग़ज़ल
जाने क्यों देख के छुपता है वो मुझ से यकसर
एक मैं हूँ कि फ़क़त शौक़-ए-लिक़ा रखता हूँ
यासिर अबुल आस
नज़्म
अता-ए-तौबा लिक़ा-ए-तू
तेरी बातों में तिरा फ़न तेरे फ़न में तेरी बात
क्यूँ हो तेरे बाब में फिर काविश-ए-ज़ात-ओ-सिफ़ात
नाज़िश प्रतापगढ़ी
शायरी के अनुवाद
तुझ से कहा था मैं ने कल ऐ बे-नज़ीर-ए-ख़ुश-लिक़ा
ऐ रश्क से तेरे फ़लक पर चाँद दोहरा हो गया
मौलाना जलालुद्दीन रूमी
ग़ज़ल
किसी यूसुफ़-लिक़ा पर दिल जो आए अह्द-ए-पीरी में
नए सर से ज़ुलेख़ा की सिफ़त फिर नौजवानी हो
वफ़ा लखनवी
ग़ज़ल
रोज़-ए-अज़ल से हम हैं हुस्न-ओ-लिक़ा के शाएक़
शर्म-ओ-हया की बातें क्या क्या सुनाएँ तेरी
मीरान शाह जालंधरी
ग़ज़ल
मुझे जो आज बुलाया है इस मोहब्बत से
मिरे हुज़ूर ये शौक़-ए-लिक़ा है कितनी देर



