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ग़ज़ल
ग़म तेरा बन चुका है मिरे दिल का मा-हसल
बेगाना-ए-ख़ुशी हूँ क़रारों को क्या करूँ
भगवान खिलनानी साक़ी
ग़ज़ल
सोचना क्या है अभी कार-ए-नज़र का मा-हसल
हम तो यूँ ख़ुश हैं कि आग़ाज़-ए-सफ़र आँखों का है
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
बुझा सकेगी न मुझ को हवा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ
मैं ताक़-ए-मा-हसल-ए-ख़ैर-ओ-शर में रौशन हूँ
मोहम्मद अहमद रम्ज़
ग़ज़ल
यही एक गौहर-ए-बे-बहा मिरी ज़िंदगी का है मा-हसल
मुझे डर है तेरी ये बे-रुख़ी ग़म-ए-आरज़ू को मिटा न दे
मंसूर अहमद
ग़ज़ल
किसी पुर-पेच रस्म-ए-दोस्ती का मा-हसल ये है
घनेरे जंगलों के रास्ते हमवार होते हैं
सय्यद अमीन अशरफ़
ग़ज़ल
मरना ही जब जहाँ में है जीने का मा-हसल
नाहक़ उठाएँ किस लिए एहसान-ए-ज़िंदगी

