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ग़ज़ल
इक गुल के मुरझाने पर क्या गुलशन में कोहराम मचा
इक चेहरा कुम्हला जाने से कितने दिल नाशाद हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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रेख़्ता शब्दकोश
ma'a
म'अ مَعَہ
رک : مع جو اس کا درست املا ہے
makaa
मका مَکا
शिकरे के समान एक पक्षी जो सीटी बहुत बजाता है, ज़मीन पर बैठता है तो ऐसा अनुभूत होता है जैसे उठने और उड़ने की सामर्थ्य नहीं रखता, जब चरवाहे के निकट पहुँचता है तो उचक कर दूसरी जगह बैठ जाता है और देर तक चरवाहे को इसी तरह सताता रहता है, उसको फ़ारसी में शबान-ए-ग़रीब कहते हैं, जंगल में रहता है और विचित्र घर बनाता है
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ग़ज़ल
कहीं कहीं से कुछ मिसरे एक-आध ग़ज़ल कुछ शेर
इस पूँजी पर कितना शोर मचा सकता था मैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
शहरों में ही ख़ाक उड़ा लो शोर मचा लो बे-जा लो
जिन दश्तों की सोच रहे हो वो कब के बरबाद हुए
जौन एलिया
नज़्म
ऐ नए साल बता तुझ में नया-पन क्या है
ऐ नए साल बता तुझ में नया-पन क्या है
हर तरफ़ ख़ल्क़ ने क्यों शोर मचा रखा है
फ़ैज़ लुधियानवी
हास्य
हम कहते हैं शहर में होंगी नौ सो लड़कियाँ कम-से-कम
ये क्या ज़िद है प्यार की माला हम ही को पहनाएँगे






