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ग़ज़ल
तिरी तमन्ना न सह सकेगी मलामत-ए-शर्म-ए-ना-रसाई
ख़ुद अपने दामन को तू झुका दे कि थाम ले हाथ आरज़ू का
इज्तिबा रिज़वी
ग़ज़ल
मुहम्मद तौसीफ़
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ग़ज़ल
हुए इत्तिफ़ाक़ से गर बहम तो वफ़ा जताने को दम-ब-दम
गिला-ए-मलामत-ए-अक़रिबा तुम्हें याद हो कि न याद हो
मोमिन ख़ाँ मोमिन
नज़्म
नज़्र-ए-मिर्ज़ा-'ग़ालिब'
कई बेटों की पै-दर-पै जुदाई भी सही तुम ने
तुम्हारे सब्र-ओ-ज़ब्त-ए-नफ़्स के क़ाइल सभी ग़ालिब
हसन नवाब हसन
नज़्म
मुझे विर्सा नहीं मिला
उस ने अपने पिंदार की किर्चियाँ समेट कर दराज़ में रक्खीं
इज़्ज़त-ए-नफ़्स के टुकड़े अलमारी में छुपाए
हमीदा शाहीन
ग़ज़ल
मुझ को मलामत-ए-ख़ल्क़ ख़ातिर में नाहीँ हरगिज़
ज़ुल्फ़ाँ की फ़िक्र में मैं दीवाना हो रहा हूँ
फ़ाएज़ देहलवी
नज़्म
वक़्त की चीज़
तेरे नुमूद पर करे फ़ख़्र हर एक बा-कमाल
इज़्ज़त-ए-क़ौम का है जुज़ इज़्ज़त-ए-नफ़्स का सवाल