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नज़्म
मदह
मालूम है उन को कि रिहा होगी कसी दिन
ज़ालिम के गिराँ हाथ से मज़लूम की तक़दीर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
क्यूँ न चेहरे पे मलूँ ख़ाक-ए-दर-ए-यार को मैं
यही वो ख़ाक है जो ख़ाक-ए-शिफ़ा होती है
फ़ना बुलंदशहरी
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ग़ज़ल
गर मलूँ मैं कफ़-ए-अफ़्सोस तो हँसता है वो शोख़
हाथ में हाथ किसी शख़्स के दे कर अपना



