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ख़लील मामून

1949 | बैंगलोर, भारत

प्रमुख उत्तर-आधुनिक शायर

प्रमुख उत्तर-आधुनिक शायर

ख़लील मामून

ग़ज़ल 24

शेर 27

लफ़्ज़ों का ख़ज़ाना भी कभी काम आए

बैठे रहें लिखने को तिरा नाम आए

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ऐसा हो ज़िंदगी में कोई ख़्वाब ही हो

अँधियारी रात में कोई महताब ही हो

हज़ारों चाँद सितारे चमक गए होते

कभी नज़र जो तिरी माइल-ए-करम होती

हर एक काम है धोका हर एक काम है खेल

कि ज़िंदगी में तमाशा बहुत ज़रूरी है

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मेरी तरह से ये भी सताया हुआ है क्या

क्यूँ इतने दाग़ दिखते हैं महताब में अभी

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पुस्तकें 17

Aafaaq Ki Taraf

 

2007

Banbas Ka Jhoot

 

2011

जिस्म-ओ-जाँ से दूर

 

2010

Kannad Adab

 

1994

La Ilah

 

2018

Lahu Ki Dhoop

 

2009

Lisan : Falsafe Ke Aaine Mein

 

1988

Mahmood Ayaz : Ek Guftagu

 

2009

Nishat-e-Gham

 

2003

सांसों के पार

 

2015

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