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ग़ज़ल
अपनी ग़ैरत बेच डालें अपना मस्लक छोड़ दें
रहनुमाओं में भी कुछ लोगों का ये मंशा तो है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
लब पे पाबंदी तो है
अपनी ग़ैरत बेच डालीं अपना मस्लक छोड़ दें
रहनुमाओं में भी कुछ लोगों का ये मंशा तो है
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
इश्क़ से तौबा भी है हुस्न से शिकवे भी हज़ार
कहिए तो हज़रत-ए-दिल आप का मंशा क्या है
फ़िराक़ गोरखपुरी
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manshaa
मंशा مَنشا
प्रकट होने का स्थान, पैदा या शुरू होने की जगह, उगने और विकसित होने की जगह, बढ़ने और फलने-फूलने की जगह, (सामान्यतः मौलिद इत्यादि के साथ)
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ग़ज़ल
मजबूरी-ए-साक़ी भी ऐ तिश्ना-लबो समझो
वाइज़ का ये मंशा है मय-ख़्वारों में चल जाए
फ़ना निज़ामी कानपुरी
ग़ज़ल
इलाही किस तरह अक़्ल ओ जुनूँ को एक जा कर लूँ
कि मंशा-ए-निगाह-ए-इश्वा-ज़ा यूँ भी है और यूँ भी
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
मैं किस से कहूँ क्या कहूँ सुनता है वहाँ कौन
उस का ही ये मंशा है कि मैं कुछ नहीं कहता
दत्तात्रिया कैफ़ी
ग़ज़ल
पल्लवी मिश्रा
ग़ज़ल
दुनिया का मंशा है प्यारे हम घुट घुट कर मर जाएँ
दिल की धड़कन ये कहती है इक दिन बदलेंगे हालात
जमील मलिक
नज़्म
नाम ओ नसब
पुश्त-दर-पुश्त बिला फ़स्ल वो अज्दाद मिरे
अपने आक़ाओं की मंशा थी मशिय्यत उन की
अली अकबर नातिक़
नज़्म
तवाइफ़
मेरा मंशा नहीं अक़्वाम-ए-ज़ुबूँ की तस्ख़ीर
मेरा मक़्सद नहीं पहनाऊँ ख़िरद को ज़ंजीर
इज़हार मलीहाबादी
ग़ज़ल
उस ने कहा किस से गिला मैं ने कहा तक़दीर से
उस ने कहा तक़दीर क्या मैं ने कहा मंशा तिरा
ताैफ़ीक़ हैदराबादी
ग़ज़ल
न वो फ़रियाद का मतलब न मंशा-ए-फ़ुग़ाँ समझे
हम आज अपनी शब-ए-ग़म की ग़लत-सामानियाँ समझे










