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नज़्म
'गाँधी-जी' की याद में!
वही है शोर-ए-हाए-ओ-हू, वही हुजूम-ए-मर्द-ओ-ज़न
मगर वो हुस्न-ए-ज़िंदगी, मगर वो जन्नत-ए-वतन
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
आहंग-ए-नौ
मर्द-ओ-ज़न पीर-ओ-जवाँ इन के मज़ालिम के शिकार
ख़ून-ए-मासूम में डूबी हुई इन की तलवार
असरार-उल-हक़ मजाज़
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ग़ज़ल
शायद उसी का ज़िक्र हो हर रहगुज़र में मैं
सुनता हूँ गोश-ए-दिल से हर इक मर्द-ओ-ज़न की बात
जुरअत क़लंदर बख़्श
नज़्म
यौम-ए-यादगार-ए-'सर-सय्यद' दर-दकन
लेकिन ये याद रक्खो सच्ची शुआ' वो है
आँखों का नूर बन कर फैले जो मर्द-ओ-ज़न में
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
हमें दुख भोगना लेकिन हमारी नस्लें सुख पाएँ
ये मन में ठान लें अपने ये हिन्दी मर्द-ओ-ज़न पहले
विनायक दामोदर सावरकर
नज़्म
असहाब-ए-गिर्या
मोहर्रम के दिनों में शाम होते ही
हुसैनाबाद के मर्द-ओ-ज़न काले लिबासों में
ज़ुबैर रिज़वी
नज़्म
होली
फिर हवा-ए-तुंद ले कर आई होली की बहार
हाथ में पिचकारियाँ ले कर चले फिर मर्द-ओ-ज़न
अर्श मलसियानी
नज़्म
ऐ ज़मिस्ताँ की हवा तेज़ न चल
मर्द-ओ-ज़न कूचा-ओ-बाज़ार में रुस्वा हैं अभी
जैसे हो क़हर-ए-मुजस्सम तिरी यख़-बस्ता जबीं
असलम अंसारी
शेर
शायद उसी का ज़िक्र हो यारो मैं इस लिए
सुनता हूँ गोश-ए-दिल से हर इक मर्द-ओ-ज़न की बात
जुरअत क़लंदर बख़्श
कुल्लियात
हो चुका रहना मिरा बस्ती में आख़िर कब तलक
नाला-ए-शब से क़यामत रोज़ मर्द-ओ-ज़न पे है

