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नज़्म
जिस रोज़ क़ज़ा आएगी
बे-तलब पहले-पहल मर्हमत-ए-बोसा-ए-लब
जिस से खुलने लगें हर सम्त तिलिस्मात के दर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ये मातम-ए-वक़्त की घड़ी है
ये मर्हमत शैख़-ए-बद-ज़बाँ की
ये जामा-ए-रोज़-ओ-शब-गज़ीदा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
अदा जाफ़री
नज़्म
एक अलामत
किसी जुगनू के चमकने पे फ़ुग़ाँ होती है
कभी इस मर्हमत-ए-ख़ास का अंदाज़ा नहीं
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
इशरत-ए-तन्हाई
मैं हमा-शौक़-ओ-मोहब्बत वो हमा-लुत्फ़-ओ-करम
मरकज़-ए-मर्हमत-ए-महफ़िल-ए-ख़ूबाँ हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
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ग़ज़ल
मरहमत फ़रमा के ऐ 'सीमाब' ग़म की लज़्ज़तें
ज़ीस्त की तल्ख़ी को फ़ितरत ने गवारा कर दिया
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
खेती
और बढ़ने के मवाक़े भी हमें देता है वक़्त
सब्ज़ को ज़र्रीं बताने की इजाज़त मर्हमत करता है और

