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शेर
आँखों को फोड़ डालूँ या दिल को तोड़ डालूँ
या इश्क़ की पकड़ कर गर्दन मरोड़ डालूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
शाम-ए-अयादत
चपेटें जिन की सरकशों की गर्दनें मरोड़ दें
अभी तो सीना-ए-बशर में सोते हैं वो ज़लज़ले
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
आँखों को फोड़ डालूँ या दिल को तोड़ डालूँ
या इश्क़ की पकड़ कर गर्दन मरोड़ डालूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
हास्य
खालिद इरफ़ान
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नज़्म
परिंदा कमरे में रह गया
एक आदमी पुराने कैलन्डर पर निशान लगा रहा था
दूसरा नया कैलन्डर हाथ में मरोड़ रहा था
सारा शगुफ़्ता
शेर
खालिद इरफ़ान
ग़ज़ल
है मुद्दतों से तेरे इंतिज़ार में भी इक लहद
भलाई चाहे वाँ तो नफ़्स अपना कुछ मरोड़ तू
गुलज़ार मुरादाबादी
ग़ज़ल
शैतानी पंजा क्या चीज़ एक मुजाहिद तू है 'अज़ीज़'
शैतानी पंजे को मरोड़ वर्ना फिर पछताएगा
अज़ीज़ अन्सारी
नज़्म
तअ'ल्लुक़ की ना-जाएज़ तजावुज़ात
उन तमाम दीवार-गीर अंदाज़ों पर
जो हमें तोड़-मरोड़ कर लिखते थे
सिदरा सहर इमरान
हास्य
मगर बस अपने ही बारे में कुछ नहीं मालूम
मरोड़ कल से जो मेदे में है सबब क्या है













