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नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
ख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगा
अब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नूर-जहाँ के मज़ार पर
सहमी सहमी सी फ़ज़ाओं में ये वीराँ मरक़द
इतना ख़ामोश है फ़रियाद-कुनाँ हो जैसे
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
ज़रा ऐ कुंज-ए-मरक़द याद रखना उस हमिय्यत को
कि घर वीरान कर के हम तुझे आबाद करते हैं
चकबस्त बृज नारायण
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ग़ज़ल
थीं लाख गरचे महशर ओ मरक़द की उलझनें
गुत्थी को ज़ब्त-ए-शौक़ की सुलझा के पी गया
एहसान दानिश कांधलवी
नज़्म
मेरे कमरे में उतर आई ख़मोशी फिर से
जैसे मरक़द के सिरहाने कोई ख़ामोश चराग़
जैसे सुनसान से मक़्तल की सलीब
मोहसिन नक़वी
ग़ज़ल
आए थे बिखेरे ज़ुल्फ़ों को इक रोज़ हमारे मरक़द पर
दो अश्क तो टपके आँखों से दो फूल चढ़ाना भूल गए
अब्दुल हमीद अदम
ग़ज़ल
क़त्ताल-ए-जहाँ माशूक़ जो थे सूने पड़े हैं मरक़द उन के
या मरने वाले लाखों थे या रोने वाला कोई नहीं
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
'रसा' हाजत नहीं कुछ रौशनी की कुंज-ए-मरक़द में
बजाए-शम्अ याँ दाग़-ए-जिगर हर वक़्त जलते हैं



