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ग़ज़ल
मिरा क्या है मुझे काँटों पे सो लेने की 'आदत है
मसाफ़-ए-ज़िंदगी में बालिश-ओ-बिस्तर न रक्खूँगा
जुनैद हज़ीं लारी
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
मसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा कर
शबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जा
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
'अदू की फ़ौज सफ़-बस्ता मुसल्लह भी मुनज़्ज़म भी
मगर हम हैं अभी ग़र्क़-ए-ख़याल-ए-रज़्म-आराई
अब्दुल्लाह ख़ालिद
मर्सिया
कौन होगा मर्द-ए-मैदाँ अब मसाफ़-ए-दहर का
हाथ में किस के चला है गो वो चौगां छोड़ कर
ख़ुशी मोहम्मद नाज़िर
ग़ज़ल
हमीं हैं अब हक़ाएक़ से जो कतरा कर निकलते हैं
हमीं थे जो मसाफ़-ए-ज़िंदगी में सफ़-ब-सफ़ निकले
अंजुम रूमानी
ग़ज़ल
वो मसाफ़-ए-जीस्त में हर मोड़ पर तन्हा रहा
फिर भी होंटों पर न उस के कोई भी शिकवा रहा
अलक़मा शिबली
शेर
कमर बाँधो मुक़द्दर के सहारे बैठने वालो
शिकस्त-ए-रज़्म से राहों का पेच-ओ-ख़म न बदलेगा