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ग़ज़ल
जो होना है सो दोनों जानते हैं फिर शिकायत क्या
ये बे-मसरफ़ ख़तों का सिलसिला अच्छा नहीं लगता
आशुफ़्ता चंगेज़ी
नज़्म
तौक़-ओ-दार का मौसम
हदीस-ए-बादा-ओ-साक़ी नहीं तो किस मसरफ़
ख़िराम-ए-अब्र-ए-सर-ए-कोहसार का मौसम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
मोहल्ले वाले मेरे कार-ए-बे-मसरफ़ पे हँसते हैं
मैं बच्चों के लिए गलियों में ग़ुब्बारे बनाता हूँ
सलीम अहमद
नज़्म
एक ज़ाती नज़्म
की बीनाई का मसरफ़ था... वो लब दो चार दिन पहले
मिरे माथे पे हो कर सब्त जो कहते थे'' तुम जाओ
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
आज का दिन भी बे-मसरफ़ सी सोचों ही में बीत गया
आज के दिन भी यूँ ही पड़े फिर घर के सारे काम रहे
शबनम शकील
ग़ज़ल
अब सोचने बैठा हूँ कि मसरफ़ मिरा क्या है
मजबूर-ए-मोहब्बत हूँ न पाबंद-ए-वफ़ा हूँ
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
ग़ज़ल
मिरे इस कार-ए-बे-मसरफ़ को क्या समझेगी ये दुनिया
मिरी ये सई-ए-ला-हासिल हर इक हासिल से आगे है
ख़ुशबीर सिंह शाद
ग़ज़ल
बे-मसरफ़-ओ-बे-कार हूँ अब राख की मानिंद
चिंगारी थी जो मुझ में जो शोला था वो तुम थे
मुर्तज़ा बरलास
नज़्म
वक़्त और दरिया
वक़्त ही का मसरफ़-ए-जाएज़ 'निसार'
बाग़-ए-हस्ती को है करता पुर-बहार
निसार अब्बासी
ग़ज़ल
क्या मसरफ़-ए-बेजा से फ़लक को है सरोकार
वो शय किसू को दे जो हो दिल-ख़्वाह किसू की







