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नज़्म
फ़ना
जितने जहाँ में नाच हैं कंगनी से ता-गेहूँ
और जितने मेवा-जात हैं तर ख़ुश्क गूना-गूं
नज़ीर अकबराबादी
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नज़्म
एक पौदा और घास
मुझ में और तुझ में नहीं कुछ भी तमीज़
सिर्फ़ साया और मेवा है अज़ीज़
इस्माइल मेरठी
ग़ज़ल
क्या मज़े का है तिरे सेब-ए-ज़नख़दाँ का ख़ाल
लज़्ज़त-ए-मेवा-ए-फ़िरदौस है इस दाने में
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
ज़क़न है सेब तो उन्नाब है लब-ए-शीरीं
नहीं है सर्व वो ख़ुश-क़द जो मेवा-दार न हो
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
जब ये मेवा हुस्न का रस रस पक कर होवेगा तय्यार
नाइका इस की क़ीमत का जब देखा चाहिए क्या लेगी
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
पहुँचे था अपना दस्त-ए-हवस जिस पे गाह गाह
वो शाख़-ए-मेवा-दार भी हैहात बढ़ गई
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
हास्य
कभी अंगूर थी अब ख़ुश्क मेवा हो गई हूँ मैं
मिरा शौहर है ज़िंदा और बेवा हो गई हूँ मैं
खालिद इरफ़ान
ग़ज़ल
निकाले उन से गुल ओ मेवा शाख़ ओ बर्ग-ओ-बार
सब उस के लुत्फ़-ओ-करम के हैं आम ये इनआ'म


