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नज़्म
यहाँ दिलदार-बेगम दफ़्न है
उस की अंधी कोठरी पर एक कतबा नस्ब है
''इस जगह दिलदार-बेगम दफ़्न है
ज़ेहरा निगाह
ग़ज़ल
सेहन-ए-दिल में कब से तन्हाई के ख़ेमे नस्ब हैं
अब न शायद मौसम-ए-हंगामा-पर्वर आएगा
सुल्तान अख़्तर
शेर
हम तो दिल ही पर समझते थे बुतों का इख़्तियार
नस्ब-ए-का'बा में भी अब तक एक पत्थर रह गया
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
ग़ज़ल
पुकारती है मुझे ख़ाक-ए-ख़िश्त-ए-पैवस्ता
ये नस्ब होने का है ख़त्म सिलसिला तुझ पे
अफ़ज़ाल अहमद सय्यद
नज़्म
सुकूत-ए-शब में
वो रेगज़ार के सीने पे नस्ब इक ख़ेमा
न जाने कौन सी तारीख़ लिखने वाला था
तारिक़ क़मर
कुल्लियात
लख़्त-ए-दिल आँखों से गिरा सो टुकड़ा ला'ल का था गोया
नस्ब करूँगा 'मीर' जिगर पर ख़ुश-रंग ऐसे नगीने को
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
गूँजने लगता है ये भी जब फ़ुग़ाँ करता हूँ मैं
नस्ब हैं मेरे क़फ़स में क्या जरस की पुतलियाँ



