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ग़ज़ल
फ़ितरत मेरी 'इश्क़-ओ-मोहब्बत क़िस्मत मेरी तन्हाई
कहने की नौबत ही न आई हम भी किसू के हो लें हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
ख़ातून-ए-मशरिक़
गर्म हो तेज़ाब की खौलन से लाले का अयाग़
ग़ुंचा-ए-नौरस का ताक़ और पीर-ए-मकतब का चराग़
जोश मलीहाबादी
नज़्म
दूरी
अब जो इक बहर-ए-ख़मियाज़ा-कश बन गया है!
तो फिर अज़-सर-ए-नौ मसर्रत से, नौ-रस नई फ़ातेहाना मसर्रत से
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
दम-ए-तक़रीर खिल उठते हैं गुलिस्ताँ क्या क्या
यूँ तो इक ग़ुंचा-ए-नौरस है दहन क्या कहना
फ़िराक़ गोरखपुरी
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नज़्म
दोशीज़ा मालन
रंगीनियों में खेली गुलों में पली हुई
नौरस कली में क़ौस-ए-क़ुज़ह है ढली हुई
कैफ़ी आज़मी
ग़ज़ल
इन नौ-रस आँखों वालों का क्या हँसना है क्या रोना है
बरसे हुए सच्चे मोती हैं बहता हुआ ख़ालिस सोना है
साग़र निज़ामी
ग़ज़ल
आँखों की कुछ नौरस कलियाँ नीम-शगुफ़्ता ग़ुंचा-ए-लब
कैसे कैसे फूल भरे हैं गुल्चीनों के दामन में
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
ख़ुदा तुझे आफ़ियत की आबादियों में नौरस सफ़ीर रक्खे
उधर के दीवार-ओ-दर सलामत मिरी तरफ़ से सलाम कहना
अज़ीज़ हामिद मदनी
ग़ज़ल
आओ इक दो पल सुस्ता लें माज़ी की दीवार तले
सेज भी है नौरस कलियों की बरखा भी अँगारों की






