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तंज़-ओ-मज़ाह
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साक्षात्कार
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
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कहानी
मोहम्मद हामिद सिराज
नज़्म
ओपन हाट् सर्जरी
पहली आवाज़ ग़ुस्सैली गरजती
देखियो मत खोलियो इस विश भरे मूज़ी का मुँह
रज़ी हैदर गिलानी
नज़्म
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ
मुझ से पहले कितने शा'इर आए और आ कर चले गए
कुछ आहें भर कर लौट गए कुछ नग़्मे गा कर चले गए
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
बस-कि रोका मैं ने और सीने में उभरीं पै-ब-पै
मेरी आहें बख़िया-ए-चाक-ए-गरेबाँ हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
तिरी दुनिया में जीने से तो बेहतर है कि मर जाएँ
वही आँसू वही आहें वही ग़म है जिधर जाएँ
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
हज़रत-ए-नासेह गर आवें दीदा ओ दिल फ़र्श-ए-राह
कोई मुझ को ये तो समझा दो कि समझावेंगे क्या
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
आख़िरी ख़त
छिन जाएँगे मुझ से मिरे आँसू मिरी आहें
छिन जाएगी मुझ से मिरी बे-कार जवानी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मजबूरियाँ
मैं आहें भर नहीं सकता कि नग़्मे गा नहीं सकता
सकूँ लेकिन मिरे दिल को मयस्सर आ नहीं सकता










