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उसलूबियात-ए-अनीस

गोपी चंद नारंग


अनुवाद : Rekhta Editor

गोपी चंद नारंग

उसलूबियात-ए-अनीस

गोपी चंद नारंग

MORE BYगोपी चंद नारंग

    अनीस के शेरी कमाल (काव्य-कौशल) और उनकी फ़साहत (भाषा की सुंदरता/वाक्पटुता) की दाद किसने नहीं दी, लेकिन अनीस के साथ इंसाफ़ सबसे पहले शिबली ने किया और आने वालों के लिए अनीस की महानता को स्वीकार करने का रास्ता खोल दिया। बाद में अनीस के बारे में हमारी तनक़ीद (आलोचना) ज़्यादातर शिबली के दिखाए हुए रास्ते पर ही चलती है। अनीस की शायरी की खूबियों के बयान में शिबली ने जो कुछ लिखा था, पौन सदी गुज़रने के बावजूद उसमें कोई बुनियादी इज़ाफ़ा (वृद्धि) आज तक नहीं किया जा सका।

    शिबली ने अनीस की फ़साहत के सिलसिले में जो कुछ लिखा था, वह दरअसल पूर्वी काव्य-सिद्धांत की आख़िरी शमा के भड़क उठने का मंज़र था। शिबली ने 'शेर-उल-अजम' और 'मुवाज़ना-ए-अनीस-ओ-दबीर' लिखकर पूर्वी काव्यशास्त्र (शेरियात) और सौंदर्यशास्त्र (जमालियात) की जो ख़िदमत की थी, वैसी और उस स्तर की फिर किसी से हो सकी। हाली का मामला दूसरा है। वह शायरी में पुनर्जागरण के अग्रदूत थे, जिसका तार्किक नतीजा आगे चलकर बुद्धिवाद और उपयोगितावाद पर ज़ोर देने की शक्ल में ज़ाहिर हुआ। शिबली शेर में आनंद, मज़ा और फ़साहत शैली के दीवाने थे। इस तरह दोनों के व्यक्तित्व बाद के उर्दू शायरों के प्रमुख रुझान यानी 'नासिख़ियत' (नासिख़ की शैली) से बग़ावत के तौर पर उभरे थे। लेकिन दोनों की प्रतिक्रिया उनके अपने-अपने व्यक्तिगत स्वभाव का अंदाज़ लिए हुए थी।

    अनीस के ज़माने में शायरी के दो अंदाज़ आम थे। एक तो वही पुराना था जिसके आधार पर मीर तक़ी मीर को 'ख़ुदा-ए-सुख़न' (शायरी का ख़ुदा) माना गया था और जो अपने व्यापक अर्थों में दिल्ली के शायरों से जोड़ा जाता था, यानी ग़ज़लियत, दर्दमंदी, दर्द और तड़प, भावनाओं का चित्रण, बयान का मज़ा, शैली का नयापन, सरलता, रवानी और अर्थ व्यक्त करने में सुंदरता और सलीक़ा, जिसे आम बोलचाल में फ़साहत कहते थे। और दूसरा वह जिसे नासिख़ और उनके शागिर्दों, पैरोकारों और समकालीनों ने शोहरत की बुलंदी तक पहुँचाया था और जिसे अपनी-अपनी शायरी के ज़रिए मज़बूती बख़्शी थी। यानी जिसमें मुख्य रूप से बयान पर पकड़, महारत, शब्दों की बाज़ीगरी, शब्दालंकार और अर्थालंकार (सीमित अर्थों में), नए विषय पैदा करना, नाज़ुक-ख़याली और विद्वता का इज़हार ही शायरी का मक़सद और चरम लक्ष्य समझा जाता था।

    अनीस की कला को पूरी तरह समझने के लिए यह जानना बहुत ज़रूरी है कि अनीस का काव्य-व्यक्तित्व इस बनावटी रुझान के ख़िलाफ़ एक प्रतिक्रिया की हैसियत रखता है। उस ज़माने के लखनऊ में नासिख़ियत का डंका बजता था, नासिख़ियत का ही चलन था। उर्दू की काव्य-परंपरा में भाषा पर अधिकार और महारत का बेहतरीन इज़हार क़सीदे के माहौल में ही मुमकिन था। नासिख़ और उनके पैरोकारों ने अपनी कारीगरी और निर्जीव तुकबंदी के लिए ताक़त इसी परंपरा से हासिल की होगी क्योंकि ग़ज़ल की पिछली परंपरा में सिवाए शाह नसीर के ऐसी कोई मिसाल नहीं थी। ख़ुद शाह नसीर की मानसिकता ने जिस संरक्षण वाले माहौल के प्रभाव में इन तत्वों को क़सीदे की परंपरा से अपनाया था, वे कई गुना बढ़ी हुई सूरत में लखनऊ के नवाबी माहौल में मौजूद थे। नासिख़ और उनके अनुयायियों ने ग़ज़ल में इस परंपरा को सिर्फ़ एक प्रमुख रुझान की शक्ल दी बल्कि इसे इस हद तक भव्य और प्रतिष्ठित बनाया कि दूसरे तमाम रंग इसके सामने फीके पड़ गए।

    अनीस ने मरसिए में सचेत रूप से अपने युग के इस प्रमुख रुझान से किनारा किया, लेकिन नासिख़ियत से बाज़ी मार ले जाना बिना उसके हथियार इस्तेमाल किए मुमकिन था। यूँ तो फ़साहत की अवधारणा हर दौर में काफ़ी अस्पष्ट और आंतरिक अनुभूति वाली रही है, साथ ही हर सौंदर्यशास्त्रीय अवधारणा की तरह जितना इसे रुचि के स्तर पर महसूस किया जा सकता है, उतना इसे वस्तुनिष्ठ (objective) रूप से व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। फिर भी अनीस के सिलसिले में यह सवाल उठाया जा सकता है कि क्या अनीस की फ़साहत वैसी फ़साहत थी जिसकी अवधारणा प्राचीन या मध्यकालीन कवियों के यहाँ मिलती है या उन्होंने मरसिए के माहौल में क़सीदे की परंपरा से (अचेतन रूप से ही सही) फ़ायदा उठाकर फ़साहत के प्रचलित अर्थ में नए आयामों का इज़ाफ़ा किया? इस तरह मानो नासिख़ियत के कुछ तत्वों का कायापलट करके उन्होंने नासिख़ियत से टक्कर ली, मरसिए को नया सौंदर्यशास्त्रीय स्वाद दिया और अप्रत्यक्ष रूप से नासिख़ियत की हार में एक ऐतिहासिक किरदार अदा किया।

    यह बात भी ग़ौर करने लायक़ है कि क्या उर्दू को उनकी सबसे बड़ी देन यही तो नहीं। शिबली अनीस की शायरी को समझने वाले हैं लेकिन याद रहे कि वह उनके तरफ़दार (समर्थक) भी हैं और इस तरफ़दारी में उन्होंने अनीस की फ़साहत की जो अवधारणा पेश की है वह बिना शर्त है और शायद इस लिहाज़ से उस पर पुनर्विचार की ज़रूरत है, जैसा कि आगे चलकर स्पष्ट किया जाएगा। शिबली को इस फ़साहत का सुराग़ ख़ुद अनीस के बार-बार दोहराए हुए बयानों में मिला। शिबली का क़ुसूर सिर्फ़ इतना है कि तारीफ़ के जोश में उन्होंने अनीस के बयानों को ज्यों का त्यों मान लिया, हालाँकि अनीस के मशहूर मरसिए, 'नमक-ख़्वान-ए-तकल्लुम है फ़साहत मेरी', के दूसरे मिसरे में बलाग़त (प्रभावशीलता/अर्थपूर्णता) का ज़िक्र बेवजह नहीं, 'नातिक़े बंद हैं सुन सुन के बलाग़त मेरी'। यहाँ बलाग़त महज़ शेर पूरा करने के लिए नहीं है, हालाँकि ख़ुद अनीस को गहरा एहसास अपनी फ़साहत का ही था,

    एक क़तरे को जो दूँ बस्त तो क़ुल्ज़ुम कर दूँ

    बहर-ए-मव्वाज, फ़साहत का तलातुम कर दूँ

    इसी मशहूर मरसिए में पूरी शायराना शान के साथ फ़रमाया है,

    ये फ़साहत ये बलाग़त ये सलासत ये कमाल

    मोजज़ा गर इसे कहिए तो है सेहर-ए-हलाल

    एक और बंद में कहते हैं,

    है कजी ऐब मगर हुस्न है अबरू के लिए

    तीरगी बद है मगर नेक है गेसू के लिए

    सुरमा ज़ेब है फ़क़त नर्गिस-ए-जादू के लिए

    ज़ेब है ख़ाल-ए-सियह चेहरा-ए-गुल-रू के लिए

    दानद आँ कस कि फ़साहत ब-कलामे दारद

    हर सुख़न मौक़ा हर नुक़्ता मक़ामे दारद

    अनीस के मरसिए के बारे में इस पहलू को पूरी तरह परखने की ज़रूरत है कि अनीस जिस फ़साहत का दावा करते हैं और शिबली और उनके बाद आने वाले आलोचक अनीस की जिस फ़साहत की दाद देते हैं, कहीं उसका गहरा संबंध 'मुसद्दस' (छह पंक्तियों वाले छंद) के फ़ॉर्म को अत्यधिक कलात्मकता के साथ बरतने से तो नहीं है? और अगर ऐसा है तो अनीस ने मुसद्दस को इस मक़ाम तक पहुँचाने में उर्दू की काव्य-परंपरा के किन तत्वों का कायापलट किया और किन संसाधनों को बरता? मुसद्दस अनीस का आविष्कार नहीं है। मरसिए के लिए मुसद्दस का फ़ॉर्म अनीस से मुद्दतों पहले प्रचलित हो चुका था। अनीस ने इसे निखारा और ऐसी कलात्मक बुलंदी तक पहुँचा दिया कि यह शिल्प उर्दू में अमर हो गया और इसके प्रभाव बाद में आने वाले नज़्म-गो शायर भी क़ुबूल करते रहे।

    यह मालूम है कि रूप (बनावट) के लिहाज़ से मर्सिये की संरचना इसके क्रमिक विकास के साथ-साथ बदलती रही। अज़हर अली फ़ारूक़ी ने लिखा है कि शुरू-शुरू में मर्सिया, ग़ज़ल और मसनवी के रूप में रचा जाता था। इसलिए कि सोज़-ख़्वानी और लय के अंदाज़ में पढ़ने के लिए ये फ़ॉर्म बहुत मुनासिब थे (उर्दू मर्सिया, छपाई इलाहाबाद 1958 ई., पृष्ठ 8)। इसी तरह मुरब्बा और दो-बैती मर्सिये भी लिखे गए। मीर और सौदा के ज़माने तक नज़्म की हर शक्ल में मर्सिया कहा गया (सिफ़ारिश हुसैन रिज़वी, उर्दू मर्सिया, तारीख़-ए-मर्सिया छपाई दिल्ली 1965 ई., पृष्ठ 193), इस ज़माने में मर्सिये ने दरअसल साहित्यिक मुक़ाम हासिल नहीं किया था। मर्सिया सिर्फ़ रोने-रुलाने और सवाब कमाने की चीज़ था। 'बिगड़ा शायर मर्सिया-गो' की कहावत इसी ज़माने से चली होगी। लेकिन मीर और सौदा के ज़माने तक पहुँचते-पहुँचते मर्सिये से साहित्यिक माँगें शुरू हो गईं। मसीहुज़्ज़माँ का यह बयान सही है कि सौदा की तबीयत बहुमुखी थी (उर्दू मर्सिये का विकास, छपाई लखनऊ 1968 ई., पृष्ठ 115)। उन्होंने अपनी ज़हानत और सोच के नएपन से नए-नए पहलू निकाले और मर्सिये को साहित्यिक हैसियत देने के लिए अलग-अलग रास्तों से चलकर मुसद्दस तक पहुँचे। हालाँकि सौदा ने मुख़म्मस, मुस्तज़ाद, दोहरा बंद जैसी कई सूरतों में मर्सिये लिखे, लेकिन पहला मुसद्दस मर्सिया कहने का सेहरा आम तौर पर सौदा के ही सिर है।

    सौदा ने अपनी पत्रिका सबील-ए-हिदायत में मोहम्मद तक़ी 'तक़ी' की जो ख़बर ली है और उनकी तुकबंदी का जो मज़ाक़ उड़ाया है, उससे मालूम होता है कि उस ज़माने में मर्सिये की साहित्यिक हैसियत मानी जाने लगी थी और शायर मर्सिये का मक़सद सिर्फ़ मातम नहीं समझते थे बल्कि उसमें शायरी के गुण को ज़रूरी मानते थे। उस वक़्त तक मर्सिये के लिए क़सीदा, मुरब्बा, तरजीअ-बंद, तरकीब-बंद, मुख़म्मस, मुस्तज़ाद सब आज़माए जा चुके थे, लेकिन जिस कलात्मक ज़रिये से मुसद्दस की ख़ास आवाज़ की कैफ़ियत और बनावट की नाटकीयता की तरफ़ पहला क़दम उठाया गया, वह उन मर्सियों का चलन था जिनमें फ़ारसी या ब्रज भाषा की बैत (शेर) या आख़िरी मिसरा टेक के तौर पर इस्तेमाल होता था और कभी हर बंद को अलग-अलग मिसरों से बाँधा जाता था।

    कुछ मर्सियों में यह सूरत भी नज़र आती है कि चार मिसरे एक बहर (छंद) में हैं और बैत दूसरी बहर में। मुसद्दस में चार मिसरों के हम-क़ाफ़िया होने और फिर बैत में क़ाफ़िया के बदल जाने, यानी आवाज़ों और लय के इस लगातार जारी रहने वाले बदलाव के उतार-चढ़ाव में जो ज़बरदस्त सौंदर्यात्मक और नाटकीय संभावनाएँ थीं, उनकी कशिश शायद सबसे पहले इन्हीं तजुर्बों में महसूस कर ली गई थी। बहरहाल इतना मालूम है कि मुसद्दस मीर और सौदा के ज़माने में रायज (प्रचलित) हो चुका था। हालाँकि मीर के ज़्यादातर मर्सिये मुरब्बा हैं और सौदा के बहत्तर मर्सियों में आधे से ज़्यादा मुरब्बा हैं और मुसद्दस के रूप में सिर्फ़ छह मर्सिये हैं। फिर भी सौदा की रचनात्मकता और उनके तरह-तरह के रूप-संबंधी तजुर्बों से अंदाज़ा किया जा सकता है कि मर्सिये को मुसद्दस तक पहुँचाने में उनका बड़ा हाथ रहा होगा।

    यह बात ग़ौर करने लायक़ है कि उर्दू शायरी ने अपनी तमाम सिन्फ़ें (विधाएँ) यानी ग़ज़ल, क़सीदा, मसनवी, रुबाई वग़ैरह सब की सब फ़ारसी से लीं। लेकिन मर्सिये की बनावट मुसद्दस की शक्ल में हिंदुस्तान में ही वजूद में आई। फ़ारसी में मर्सिये की शुरुआत मोहताशिम काशानी (निधन 996 हिजरी) से हुई लेकिन उनके तमाम मर्सिये और उनका मशहूर मर्सिया 'दवाज़दह बंद' क़सीदे के रूप में है। (तारीख़-ए-नज़्म-ओ-नस्र दर ईरान दर ज़बान-ए-फ़ारसी, सईद नफ़ीसी, छपाई ईरान 1344 हिजरी शम्सी, पृष्ठ 443)। डॉक्टर रज़ा ज़ादा शफ़क़ ने 'तारीख़-ए-अदबियात-ए-ईरान' में लिखा है कि शहीदान-ए-कर्बला के मर्सिये में मोहताशिम काशानी का तरजीअ-बंद भी मशहूर है (छपाई 1955 ई., पृष्ठ 464)। ग़रज़ उर्दू मर्सिये का अरूज़ी (छंद का) ढाँचा वही सही, लेकिन इसकी अर्थ और शायरी की इकाई जैसी वह मुसद्दस के रूप में उर्दू में सामने आई, उसका कोई अक्स अरब में मिलता है ईरान में। यह उर्दू की अपनी चीज़ है और यह उर्दू शायरी का ऐसा पहलू है जिस पर अभी तक पूरी तरह ग़ौर नहीं किया गया।

    अब एक और पहलू को लीजिए, यानी यह कि तहत-ख़्वानी (बिना तरन्नुम के पढ़ने) का क्या हाथ मुसद्दस की बनावट में हो सकता है। देहलवी दौर तक मर्सिया-ख़्वानी में लय और सुर का चलन था। इसलिए शायरी की माँगों से ज़्यादा आवाज़, धुन, लय और संगीत पर ध्यान था। उस वक़्त दिल्ली में बहुत से आशूरख़ाने थे जिनमें मजलिसें होती थीं। दरगाह क़ुली ख़ाँ ने, जो 1738 ई. से 1741 ई. तक दिल्ली में थे, 'मुरक़्क़ा-ए-दिल्ली' में मोहताशिम काशानी और हसन काशी के फ़ारसी मर्सियों और 'रौज़त-उश-शोहदा' के मजलिसों में पढ़े जाने का ज़िक्र किया है। (मुरक़्क़ा-ए-दिल्ली, संपादक सैयद मुज़फ़्फ़र हुसैन, पृष्ठ 50 से 54)। अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जैसे-जैसे मर्सिया शायरी की परंपरा का हिस्सा बनने लगा, लय और सुर की जगह तहत-ख़्वानी का चलन होने लगा और इसके साथ-साथ मर्सिये की साहित्यिक खूबियाँ भी निखरने लगीं। तहत-ख़्वानी के लिए ग़ज़ल या मुरब्बा से कहीं ज़्यादा मुख़म्मस या मुसद्दस की ज़रूरत थी।

    सौदा के दौर में दोहरे लगाने का या तरजीअ में टेक लाने का चलन था ही। दोहरे ब्रज भाषा के और टेक की बैत फ़ारसी की प्रचलित थी। यह चलन उर्दू में ब्रज और फ़ारसी के रेख़्ता (मिले-जुले) मेल के उस चलन से अलग नहीं था जिसकी जड़ें सूफ़ीवाद की व्यापक लोकप्रियता से समाअ (सूफ़ी संगीत) की महफ़िलों में जम चुकी थीं और जिसकी बची हुई निशानियाँ आज तक क़व्वालियों में देखी जा सकती हैं।

    मर्सिये में मुसद्दस का चलन हो जाने के सिलसिले में यह बात भी अहमियत रखती है कि हमारी क्लासिकी (शास्त्रीय) शायरी ग़ज़ल, क़सीदा, मसनवी और रुबाई से मिलकर बनी है। जब यह बात साफ़ की जा चुकी है कि मर्सिया उर्दू शायरी की ख़ालिस अपनी बनावट का नमूना है, तो कहीं ऐसा तो नहीं कि मर्सिये के मुसद्दस की बनावट में इन चारों सिन्फ़ों (विधाओं) का सार घुल-मिल गया हो? अनीस के बारे में मशहूर है कि ज़माने के चलन के तहत वह सबसे पहले ग़ज़ल की तरफ़ आकर्षित हुए, बाद में मीर ख़लीक़ के मशवरे से आख़िरत (परलोक) के सवाब के लिए उन्होंने उसी ग़ज़ल को 'सलाम' कर दिया। यह खुली हुई हक़ीक़त है कि सलाम वह ग़ज़ल है जिसमें इमामों से अक़ीदत (श्रद्धा) का इज़हार होता है। अब कर्बला के वाक़यात पर नज़र डालिए तो मालूम होगा कि इस सिलसिले के सारे वाक़यात का ताल्लुक़ बुलंद हौसले, बहादुरी और आत्म-बल की उस ऐतिहासिक परंपरा से है जो इस्लाम और सामी ज़ेहन की ख़ास पहचान रही है।

    वाक़यात को लगातार बयान करने के लिए हमारे पास मसनवी थी, बुलंद हौसले और बहादुरी के बयानों के लिए हमारे पास क़सीदा था और नाज़ुक जज़्बात के इज़हार के लिए ग़ज़ल थी। चुनाँचे लय और सुर के दौर तक इन सब फ़ॉर्मों ने मर्सिये का कुछ कुछ साथ दिया, लेकिन मजलिसों की तमाम माँगें इनमें से किसी भी सिन्फ़ से पूरी नहीं हो सकती थीं। मर्सिये 'शाहनामा' या 'सिकंदरनामा' नहीं हो सकते थे क्योंकि मर्सिये में कर्बला के तमाम वाक़यात का इज़हार जुड़ा हुआ और लगातार नहीं होता। इनमें तो वाक़यात को एक-एक करके लेना पड़ता था ताकि मर्सिया एक बैठक में ख़त्म हो जाए और रोने-रुलाने के मक़सद को भी पूरा करे। क़सीदे में तारीफ़ ही तारीफ़ थी, जबकि मर्सिये के ममदूह (जिसकी तारीफ़ की जाए) की शहादत को सदियाँ गुज़र चुकी थीं और मक़सद उसकी खूबियों को ताज़ा करना और उसके ग़म में आँसू बहाना था।

    मजलिस पढ़ते हुए यह ज़रूरी था कि कर्बला के शहीदों में से किसी एक का ज़िक्र करते हुए बयान को बंदों (stanzas) में बाँट लिया जाए। हर बंद में किसी सूरत, किसी नक़्श, किसी पहलू, किसी वाक़ये, किसी संवाद या किसी हादसे का प्रभाव उभारा जाए और फिर इस सब को हर बंद के साथ इस तरह समेट लिया जाए कि सुनने वाले की भावना और कल्पना पर चोट पड़े और वह मर्सिये के विकास के साथ-साथ धीरे-धीरे इस ऐतिहासिक माहौल में खो जाए। बंद के ख़ात्मे का मक़सद रुबाई के फ़न की याद दिलाता है। यानी चौथे मिसरे में बात का निचोड़ पेश कर दिया जाए। यहाँ फ़र्क़ यह था कि बंद में चार मिसरे हम-क़ाफ़िया थे। रुबाई के चौथे मिसरे का काम दोहरे या टीप के बजाय अब बैत से लिया जाने लगा जिससे बंद का अर्थपूर्ण माहौल मुकम्मल हो जाता था। ग़रज़ इस तरह उर्दू मर्सिये का वह STANZA वजूद में आया जिसे मुसद्दस कहते हैं, लेकिन यहाँ मुझे मसनवी और रुबाई के हिस्सों पर इतना ज़ोर नहीं देना है। उनका अर्थगत संबंध हो सकता है लेकिन मुसद्दस से गहरा शैलीगत और रूपगत संबंध क़सीदे और ग़ज़ल का है जिसका विश्लेषण आगे चलकर किया जाएगा।

    अनीस तक पहुँचते-पहुँचते मुसद्दस ख़ासा मँज चुका था। दिलचस्प बात सिर्फ़ यह नहीं कि अनीस के काव्य-व्यक्तित्व ने इस फ़ॉर्म को कितना प्रभावित किया बल्कि यह भी कि ख़ुद उनकी फ़साहत (भाषा की शुद्धता) ने इस फ़ॉर्म के साँचे में ढलकर क्या शक्ल इख़्तियार की। इस तरह गोया उनकी शायरी में वह शैली सामने आई जिसके बेमिसाल होने की सब क़सम खाते हैं, लेकिन जिसके शैलीगत और ध्वनिगत संरचनात्मक तत्वों पर आज तक पूरा ध्यान नहीं दिया गया। इस बात के विश्लेषण के लिए सबसे पहले अनीस के उस शाहकार मर्सिये को लीजिए जिसका ज़िक्र इस लेख के शुरू में किया गया था, यानी नमक ख़्वान-ए-तकल्लुम है फ़साहत मेरी। चेहरे के हिस्से से ये दो बंद मुलाहज़ा हों:

    सुब्ह-ए-सादिक़ का हुआ चर्ख़ पे जिस वक़्त ज़हूर

    ज़मज़मे करने लगे याद-ए-इलाही में तयूर

    मिस्ल-ए-ख़ुर्शीद बरामद हुए ख़ेमे से हुज़ूर

    यक-ब-यक फैल गया चार तरफ़ दश्त में नूर

    शश-जिहत में रुख़-ए-मौला से ज़हूर-ए-हक़ था

    सुब्ह का ज़िक्र है क्या चाँद का चेहरा फ़क़ था

    ठंडी ठंडी वो हवाएँ, वो बयाबाँ, वो सहर

    दम-ब-दम झूमते थे वज्द के आलम में शजर

    ओस ने फ़र्श-ए-ज़मर्रुद पे बिछाए थे गुहर

    लोटी जाती थी लहकते हुए सब्ज़े पे नज़र

    दश्त से झूम के जब बाद-ए-सबा आती थी

    साफ़ ग़ुंचों के चटकने की सदा आती थी

    पहली ही नज़र में एहसास होता है कि दोनों बंदों में पहले चार-चार मिसरे की आवाज़ पर ख़त्म होते हैं यानी ज़हूर, तयूर, हुज़ूर, नूर और दूसरे में सहर, शजर, गुहर, नज़र। ध्वनिविज्ञान की शब्दावली में ऐसे ध्वनि खंड को जो किसी व्यंजन (CONSONANT) पर ख़त्म हो, CLOSE SYLLABLE या पाबंद रुक्न कहते हैं और जो अलिफ़, वाव, ये यानी स्वर (VOWEL) पर ख़त्म हो, आज़ाद या खुला हुआ रुक्न (OPEN SYLLABLE) कहते हैं। इस लिहाज़ से इन दोनों बंदों में पहले चार-चार मिसरों के क़वाफ़ी पाबंद हैं और उनमें रदीफ़ सिरे से है ही नहीं। इनके मुक़ाबले में अगर दोनों बंदों की बैत को देखिए तो सिर्फ़ यह कि दोनों बैतों में रदीफ़ है बल्कि रदीफ़ भी ऐसी जिसके आख़िरी रुक्न आज़ाद यानी खुले हुए हैं। मसलन हक़ था, फ़क़ था, और दूसरे बैत में सबा आती थी, सदा आती थी। अब ज़रा आगे बढ़िए और इन बंदों को मुलाहज़ा फ़रमाइए:

    ख़ुशा हुस्न-ए-रुख़-ए-यूसुफ़-ए-कनआन-ए-हसन

    राहत-ए-रूह-ए-हुसैन इब्न-ए-अली, जान-ए-हसन

    जिस्म में ज़ोर-ए-अली तबा में एहसान-ए-हसन

    हमा-तन ख़ुल्क़-ए-हसन, हुस्न-ए-हसन, शान-ए-हसन

    तन पे करती थी नज़ाकत से गिरानी पोशाक

    क्या भली लगती थी बचपन में शहानी पोशाक

    जब फ़रीज़े को अदा कर चुके वो ख़ुश-किरदार

    कस के कमरों को ब-सद शौक़ लगाए हथियार

    जल्वा-फ़रमा हुए घोड़े पे शह-ए-अर्श-वक़ार

    अलम-ए-फ़ौज को अब्बास ने खोला इक बार

    दश्त में निकहत-ए-फ़िरदौस-ए-बरीं आने लगी

    अर्श तक इसके फरहरे की हवा जाने लगी

    लहर वो सब्ज़ फरहरे की वो पंजे की चमक

    शर्म से अब्र में छुप जाता था ख़ुर्शीद-ए-फ़लक

    कहते थे सल्ले-अला चर्ख़ पे उठ उठ के मलक

    दंग थे सब वो समा से था समाँ ता-ब-समक

    कहिए पस्ती उसे जो औज हुमा ने देखा

    वो समाँ फिर ये कभी अर्ज़-ओ-समा ने देखा

    चमक, फ़लक, मलक, समक, या कनआन-ए-हसन, जान-ए-हसन, एहसान-ए-हसन, शान-ए-हसन वग़ैरह अल्फ़ाज़ जो सब के सब व्यंजनों पर ख़त्म होते हैं और पाबंद हैं, क्या क़सीदे की याद नहीं दिलाते? अब ज़रा बैत को भी देखिए। पहले बंद की बैत को छोड़कर आख़िरी दोनों बंदों की बैतें खुली हुई रदीफ़ में हैं यानी व्यंजनों पर नहीं बल्कि स्वरों पर ख़त्म होती हैं। ज़रा इस बैत को फिर पढ़िए:

    दश्त में इसके फरहरे की हवा जाने लगी

    अर्श तक इसके फरहरे की हवा जाने लगी

    तो फ़ौरन महसूस होता है कि बैत के शेरों में ग़ज़लियत की रूह बोल रही है। मर्सिये में चेहरा हो या सरापा, आमद हो या रजज़, रज़्म हो या शहादत, ये सब हिस्से अर्थ के लिहाज़ से क़सीदे से समानता रखते हैं। क़सीदा एक ख़ास भव्यता, ऊँचे स्वर, दबदबे और शौकत का इज़हार चाहता है और मर्सिये में ऐसे जियालों और जाँबाज़ों की तारीफ़ मक़सूद थी जिन्होंने बड़ी से बड़ी क़ुर्बानी देने से गुरेज़ नहीं किया था। गोया विषय की बुलंदी जिस ज़ोरदार बयान की माँग करती थी, वह क़सीदे के अर्थगत और रूपगत माहौल के बहुत क़रीब था। किसी भी कामयाब क़सीदे को ध्वनिगत एतबार से देखिए तो पाबंद क़वाफ़ी यानी व्यंजनों पर ख़त्म होने वाले खंडों की बजती हुई ज़ंजीर नज़र आएगी। जाने या अनजाने तौर पर अनीस की फ़साहत की पारखी नज़र क़सीदे की इस बुनियादी माँग की अनदेखी नहीं कर सकती थी।

    इस हक़ीक़त को समझ लेने के बाद अब इस बात का जानना आसान है कि अनीस का असल कमाल यह है कि क़सीदे की रूह को अपनाते हुए भी और पाबंद क़वाफ़ी (CLOSE RHYMES) में बंद कहते हुए भी उन्होंने ज़बान को कहीं बोझिल नहीं होने दिया, बल्कि भव्यता और ऊँचे स्वर के साथ सरलता और प्रवाह को भी बनाए रखा और रूप की ग़ज़ल जैसी लय की कोमलता से मर्सिये में क़सीदे और ग़ज़ल के मिश्रण से एक नई सौंदर्यपरक और शैलीगत सतह का इज़ाफ़ा किया। अनीस की फ़साहत इसी नई शैलीगत सतह का ही नाम है।

    यहाँ फ़ौरन यह सवाल उठाया जा सकता है कि अनीस के बंदों के जिन पाबंद क़वाफ़ी की तरफ़ इशारा किया गया, यह बात उनके तमाम मर्सियों में एक समान विशेषता का दर्जा रखती है या सिर्फ़ चंद बंदों तक सीमित है। मसलन मशहूर मर्सियों के जो मिसरे ज़ेहन में आते हैं, वे पाबंद क़वाफ़ी वाले नज़रिये का खंडन करते हैं:

    जब क़ता की मुसाफ़त-ए-शब आफ़ताब ने

    क्या ग़ाज़ियान-ए-फ़ौज-ए-ख़ुदा नाम कर गए

    जब रन में सर-बुलंद अली का अलम हुआ

    फाड़ा जो गरेबाँ शब-ए-आफ़त की सहर ने

    दश्त-ए-दग़ा में नूर-ए-ख़ुदा का ज़हूर है

    क्या फ़ौज-ए-हुसैनी के जवानान-ए-हसीं थे

    जब ख़ात्मा-ब-ख़ैर हुआ फ़ौज-ए-शाह का

    इन मिसरों से यह ख़याल आता है कि पाबंद क़वाफ़ी के जिस दावे को ऊपर पेश किया गया है वह सही नहीं, क्योंकि उपरोक्त मशहूर मर्सियों के मतलों से इसकी पुष्टि नहीं होती। चुनाँचे अनीस के मर्सियों की चारों नवल किशोरी जिल्दों से मदद ली गई ताकि उपरोक्त दावे के सही या ग़लत होने के बारे में अंतिम राय क़ायम की जा सके। इन चारों जिल्दों में मर्सियों की कुल तादाद और पाबंद आज़ाद ध्वनियों पर ख़त्म होने वाले क़वाफ़ी का विभाजन निम्नलिखित है:

    पहली जिल्द में कुल मर्सिये 29 हैं, जिनमें 22 आज़ाद और 7 पाबंद क़वाफ़ी से शुरू होते हैं।

    दूसरी जिल्द में कुल मर्सिये 26 हैं, जिनमें 19 आज़ाद और 7 पाबंद क़वाफ़ी से शुरू होते हैं।

    तीसरी जिल्द में कुल मर्सिये 18 हैं, जिनमें 15 आज़ाद और 3 पाबंद क़वाफ़ी से शुरू होते हैं।

    चौथी जिल्द में कुल मर्सिये 33 हैं, जिनमें 26 आज़ाद और 7 पाबंद क़वाफ़ी से शुरू होते हैं।

    कुल जोड़: 106 मर्सिये हैं जिनमें 82 आज़ाद और 24 पाबंद क़वाफ़ी से शुरू होते हैं।

    इससे तो यह साबित होता है कि पाबंद क़वाफ़ी वाले बंदों की तादाद एक चौथाई से भी कम है और मुसद्दस के बंद की जिस पाबंद बनावट पर हम ज़ोर दे रहे थे वह गुमराह करने वाली है, लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं है। यहाँ हमें इस बात से धोखा हुआ है कि यह औसत सिर्फ़ उन बंदों का है जिनसे मर्सियों की शुरुआत हुई है। बाद में आने वाले बंदों का नहीं। यह जानकर हैरानी होगी कि बाद में आने वाले सैकड़ों बंदों की हालत बिल्कुल दूसरी है। इन आँकड़ों से इतनी बात तो बहरहाल साबित हो ही गई कि अनीस अपने ज़्यादातर मर्सियों की शुरुआत खुले क़वाफ़ी वाले बंदों यानी मुसव्वतों (स्वरों) से करते हैं लेकिन जैसे-जैसे तबीयत ज़ोर मारने लगती है और कल्पना उड़ान भरने लगती है तो वह जान-बूझकर या अनजाने में क़सीदे की रूह से जुड़ जाते हैं और पाबंद क़वाफ़ी यानी मुसम्मतो (व्यंजनों) का इस्तेमाल करते हैं। इसका यह मतलब नहीं कि खुले हुए क़वाफ़ी वाले बंद आते ही नहीं। आते हैं और ज़रूर आते हैं, लेकिन अनीस का मुख्य झुकाव पाबंद क़वाफ़ी यानी मुसम्मतो की तरफ़ है।

    अनीस के मर्सियों में बंदों की इन दो शक्लों के अलावा जिनका ज़िक्र ऊपर किया गया यानी पाबंद और आज़ाद, एक शक्ल और भी मिलती है यानी कहने को तो ये बंद मुरद्दफ़ (रदीफ़ वाले) हैं लेकिन क़ाफ़िया इनमें भी पाबंद है यानी मुसम्मते (व्यंजन) पर ख़त्म होता है, जैसा कि नीचे दिए गए बंदों में, क़ामत, सूरत, सौलत, हिम्मत, पैकर, बराबर, पर, बाहर वग़ैरह से ज़ाहिर है:

    सर्व शरमाए क़द इस तरह का क़ामत ऐसी

    असद-उल्लाह की तस्वीर थे सूरत ऐसी

    शेर नारों से दहल जाते थे सौलत ऐसी

    जाके पानी पिया नहर पे हिम्मत ऐसी

    जान जब तक थी इताअत में रहे भाई की

    थे अलमदार मगर बच्चों की सक़्क़ाई की

    अब्र ढालों का उठा तेग़ दो पैकर चमकी

    बर्क़ छुपती है यह चमकी तो बराबर चमकी

    सू-ए-पस्ती कभी कौंदी कभी सर पर चमकी

    कभी अंबोह के अंदर कभी बाहर चमकी

    जिस तरफ़ आई वह नागिन उसे डसते देखा

    मेंह सरों का सफ़-ए-दुश्मन में बरसते देखा

    इस तरह के बंद भी दरअसल पाबंद क़वाफ़ी की ही श्रेणी में आते हैं। इस नज़र से देखिए तो विचाराधीन मर्सिया नमक ख़्वान-ए-तकल्लुम है फ़साहत मेरी में पाबंद और आज़ाद बंदों में नीचे दिया गया अनुपात है:

    कुल बंद 102

    पाबंद क़वाफ़ी वाले बंद 55

    खुले, आज़ाद क़वाफ़ी वाले बंद 47

    यानी मुख्य झुकाव पाबंद क़वाफ़ी वाले बंदों का है, लेकिन यह सिर्फ़ एक मर्सिये की हालत है।

    यह दावा उस वक़्त तक साबित नहीं हो सकता जब तक दूसरे मर्सियों से भी इसकी पुष्टि हो जाए। और विश्लेषण के लिए हमने अनीस के एक और शाहकार मर्सिये जब क़त्अ की मुसाफ़त-ए-शब आफ़ताब ने का चुनाव किया। इसके विश्लेषण के नतीजे नीचे दिए गए हैं:

    कुल बंद 194

    पाबंद क़वाफ़ी 140

    खुले क़वाफ़ी 54

    अब इन दोनों मर्सियों से नीचे दिया गया औसत हासिल हुआ:

    कुल बंद 102 + 194 = 296

    पाबंद क़वाफ़ी 55 + 140 = 195

    खुले क़वाफ़ी 47 + 54 = 101

    यानी पाबंद क़वाफ़ी वाले बंद कुल बंदों का 66 फ़ीसद यानी दो तिहाई हुए। यह दो मशहूर मर्सियों की हालत है। इस दावे को पक्के तौर पर साबित करने के लिए हमने नवल किशोर प्रेस से छपे अनीस के मर्सियों की चारों जिल्दों की मदद ली और हर जिल्द से पाँच-पाँच मर्सियों को कहीं-कहीं से बिना किसी ख़ास तरतीब के खोल कर देखा। इस तरह के इत्तेफ़ाक़ी (Random) और बिना पूर्व योजना के किए गए विश्लेषण से जो नतीजे सामने आए, वे नीचे दिए गए हैं:

    पहली जिल्द: पेज 62-63 = 15+3

    पेज 194-195 = 10+8

    पेज 260-261 = 13+5

    पेज 310-311 = 9+9

    पेज 338-339 = 13+5

    कुल बंद 90, 60 पाबंद, 30 आज़ाद

    दूसरी जिल्द: पेज 46-65 = 12+6

    पेज 130-131 = 11+7

    पेज 200-201 = 7+11

    पेज 262-263 = 12+6

    पेज 298-299 = 7+11

    कुल बंद 90, 49 पाबंद, 41 आज़ाद

    तीसरी जिल्द: पेज 20-21 = 14+4

    पेज 32-33 = 12+6

    पेज 62-63 = 6+12

    पेज 146-147 = 13+5

    पेज 210-211 = 13+5

    कुल बंद 90, 58 पाबंद, 32 आज़ाद

    चौथी जिल्द: पेज 48-49 = 6+12

    पेज 110-111 = 9+9

    पेज 148-149 = 9+9

    पेज 208-209 = 10+8

    पेज 278-279 = 14+4

    कुल बंद 90, 48 पाबंद, 42 आज़ाद

    48 पाबंद 42 आज़ाद

    58 पाबंद 32 आज़ाद

    49 पाबंद 41 आज़ाद

    60 पाबंद 30 आज़ाद

    कुल जोड़: कुल बंद 360, 215 पाबंद 145 आज़ाद

    औसत = 60 फ़ीसद

    नवल किशोर की जिल्दों में हर पेज पर नौ बंद हैं। यानी आमने-सामने के दो पेजों पर अठारह बंद हुए। हर जिल्द को पाँच जगह से खोला गया। यानी 18 x 5 = 90 बंद हर जिल्द से लिए गए। इस तरह चार जिल्दों से बंदों की कुल तादाद 360 हुई, जिनमें 215 में पाबंद क़वाफ़ी और 145 में खुले क़वाफ़ी हैं, इनका औसत 60 फ़ीसद का हुआ। यानी नमक ख़्वान-ए-तकल्लुम है फ़साहत मेरी और जब क़त्अ की मुसाफ़त-ए-शब आफ़ताब ने के दो मशहूर मर्सियों के विश्लेषण की मदद से हमने जो दावा पेश किया था, अब सभी जिल्दों से नमूने के तौर पर लिए गए रैंडम विश्लेषण से भी इस दावे की पुष्टि हो गई। यानी अनीस के मर्सियों के बंदों का मुख्य झुकाव पाबंद ध्वनियों यानी मुसम्मतो (व्यंजनों) की तरफ़ है, यानी अगर यह कहा जाए कि क़सीदे की रूह ने अनीस के मर्सियों में एक नया रूप इख़्तियार किया तो ग़लत होगा।

    अब मुसद्दस की बैतों यानी आख़िर में आने वाले दो मिसरों को भी लीजिए जिनकी खुली रदीफ़ों और मुँह बोलते मुसव्वतों (स्वरों) या ग़ुन्नियत (अनुनासिकता) का सीधा-सच्चा रिश्ता ग़ज़ल की बनावट के प्रभाव से जुड़ जाता है। ग़ज़ल का कोई दीवान उठाकर देखिए, अगर शायर का मक़सद सिर्फ़ मुश्किल ज़मीनों को आसान बनाना नहीं है, तो अशआर की ज़्यादा तादाद खुली ध्वनियों यानी मुसव्वतों वाले क़वाफ़ी और रदीफ़ में मिलेगी, यानी अलिफ़, वाव, और छोटी/बड़ी ये (ی/ے) की श्रेणी में या नून-ग़ुन्ना में जो अलिफ़, वाव और ये के साथ आता है। हू-ब-हू यही ध्वन्यात्मक हालत अनीस की बैतों की है। अनीस के जिन दो मशहूर मर्सियों का ज़िक्र ऊपर किया गया है, उनकी 194 + 102 = 296 बैतों में से एक भी बैत ऐसी नहीं है जिसमें खुली यानी मुसव्वतों पर ख़त्म होने वाली रदीफ़ हो। इन बैतों के सिलसिले में चंद बातें ख़ास तौर से ध्यान चाहती हैं:

    1. बैत में रदीफ़ की पाबंदी हर जगह है।

    2. रदीफ़ों में खुली ध्वनियों का इस्तेमाल किया गया है।

    3. बैत में अफ़आल (क्रियाएँ) लाज़मी तौर पर आते हैं।

    4. रदीफ़ ज़्यादातर अगर फ़ेल (क्रिया) पर नहीं तो हर्फ़-ए-जार (preposition) पर ख़त्म होती है।

    इन नुक़्तों को साफ़ करने के लिए नीचे दिए गए बंद देखें:

    कट गई तेग़ तले जब सफ़-ए-दुश्मन आई

    यक-ब-यक फ़स्ल-ए-फ़िराक़-ए-सर-ओ-गर्दन आई

    बिगड़ी इस तरह लड़ाई कि कुछ बन आई

    तेग़ क्या आई कि उड़ती हुई नागिन आई

    ग़ुल था भागो कि यह हंगाम ठहरने का नहीं

    ज़हर इसका जो चढ़ेगा तो उतरने का नहीं

    कह के यह बाग फिराई तरफ़-ए-लश्कर-ए-शाम

    पड़ गया ख़ेमा-ए-नामूस-ए-नबी में कोहराम

    रन में घोड़े को उड़ाते हुए आए जो इमाम

    रोब से फ़ौज के दिल हिल गए काँपे अंदाम

    सर झुके उनके जो कामिल थे ज़बाँ-दानी में

    उड़ गए होश फ़सीहों के रज़ज़-ख़्वानी में

    यक-ब-यक तबल बजा फ़ौज में गरजे बादल

    कोह थर्राए ज़मीं हिल गई गूँजा जंगल

    फूल ढालों के चमकने लगे तलवारों के फल

    मरने वालों को नज़र आने लगी शक्ल-ए-अजल

    वाँ के चाउश बढ़ाने लगे दिल लश्कर का

    फ़ौज-ए-इस्लाम में नारा हुआ या हैदर का

    ऊपर के तीनों बंदों में रदीफ़ हर बैत में है और हर जगह खुली हुई है। नहीं और में में ग़ुन्नियत (नासिक्य गूँज) है। अब फ़ेल (क्रिया) को देखिए, ऊपर के चार मिसरों की क्रियाओं की बंदिश में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। पहले बंद में आई फ़ेल है जिसकी चारों मिसरों में तकरार (दोहराव) हुई है। आख़िरी दो मिसरों का अंदाज़ बिल्कुल दूसरा है। ये दोनों मिसरे इमदादी फ़ेल (सहायक क्रिया) था पर टिके हुए हैं और दोनों मिसरों में फ़ेल मुकम्मल है। अनीस की अक्सर बैतों में यह होता है कि ऊपर के चार मिसरों में फ़ेल की जो भी सूरत रही हो, बैत में आकर वह मुकम्मल होती है या अपना रूप बदल कर मुकम्मल सूरत में सामने आती है। ऊपर की दूसरी बैत में सर झुके, उड़ गए और तीसरी बैत में बढ़ाने लगे, नारा हुआ सिर्फ़ ऊपर के चार-चार मिसरों के क्रियात्मक माहौल से उस्लूबियाती (शैलीगत) तौर पर अलग हैं बल्कि क्रिया के स्तर पर हर लिहाज़ से मुकम्मल भी हैं और इस अंदाज़ से सिर्फ़ बंद के मानियाती (अर्थगत) माहौल की बल्कि शैलीगत इकाई की भी तकमील (पूर्णता) होती है। इसका कुछ अंदाज़ा नीचे दी गई बैतों को बंदों के साथ पढ़ने से होगा,

    फूला शफ़क़ से चर्ख़ पे जब लाला-ज़ार-ए-सुब्ह

    गुलज़ार-ए-शब ख़िज़ाँ हुआ आई बहार-ए-सुब्ह

    करने लगा फ़लक ज़र-ए-अंजुम निसार-ए-सुब्ह

    सरगर्म-ए-ज़िक्र-ए-हक़ हुए ताअत-गुज़ार-ए-सुब्ह

    था चराग़-ए-अख़्ज़री पे यह रंग आफ़ताब का

    खुलता है जैसे फूल चमन में गुलाब का

    चलना वह बाद-ए-सुब्ह के झोंकों का दम-ब-दम

    मुर्ग़ान-ए-बाग़ की वह ख़ुश-अल्हानियाँ बहम

    वह आब-ओ-ताब-ए-नहर वह मौजों का पेच-ओ-ख़म

    सर्दी हवा में पर ज़्यादा बहुत कम

    खा-खा के ओस और भी सब्ज़ा हरा हुआ

    था मोतियों से दामन-ए-सहरा भरा हुआ

    बा-चश्म-ए-नम वहाँ से बढ़े आप चंद गाम

    गोया ज़मीं की सैर को उतरा मह-ए-तमाम

    मिस्ल-ए-नुजूम गिर्द थे हैदर के लाला-फ़ाम

    शक्लें वह नूर की वह तजम्मुल वह एहतेशाम

    ज़ुल्फ़ें हवा से हिलती थीं हाथों में हाथ थे

    लड़के भी बंद खोले हुए साथ-साथ थे

    ठंडी हवा में सब्ज़ा-ए-सहरा की वह लहक

    शर्माए जिससे अतलस-ए-ज़ंगारी-ए-फ़लक

    वह झूमना दरख़्तों का फूलों की वह महक

    हर बर्ग-ए-गुल पे क़तरा-ए-शबनम की वह झलक

    हीरे ख़जिल थे गौहर-ए-यकता निसार थे

    पत्ते भी हर शजर के जवाहर-निगार थे

    ख़ेमे में जाके शह ने यह देखा हरम का हाल

    चेहरे तो फ़क़ हैं और खुले हैं सरों के बाल

    ज़ैनब की यह दुआ है कि रब्ब-ए-ज़ुल-जलाल

    बच जाए इस फ़साद से ख़ैर-उन-निसा का लाल

    बानो-ए-नेक-नाम की खेती हरी रहे

    संदल से माँग बच्चों से गोदी भरी रहे

    इन बैतों के मुताले (अध्ययन) से यह बात पूरी तरह वाज़ेह (स्पष्ट) हो जाती है कि इनका ख़ात्मा या तो इमदादी फ़ेल (सहायक क्रिया) पर होता है या फ़ेल (क्रिया) पर या फिर हुरूफ़-ए-जार (सम्बन्धबोधक अव्यय) पर, ये सब अल्फ़ाज़ (चाहे क्रियाएँ हों या हुरूफ़-ए-जार) खुली आवाज़ों पर ख़त्म होते हैं। अनीस के यहाँ ग़ैर-मुरद्दफ़ (बिना रदीफ़ वाली) बैतें सिरे से हैं ही नहीं। अलबत्ता इक्का-दुक्का पाबंद (बंद) रदीफ़ें आई हैं। उनका तनासुब (अनुपात) यह है, पहले मर्सिए की कुल 102 बैतों में से पाबंद रदीफ़ें सिर्फ़ 5 हैं। इसी तरह दूसरे मर्सिए की कुल 194 बैतों में से पाबंद रदीफ़ें सिर्फ़ 13 हैं। गोया दोनों मर्सियों की 102+194=296 बैतों में से सिर्फ़ 5+13=18 पाबंद रदीफ़ें हैं। यह कुल बैतों का 6 फ़ीसद से ज़्यादा नहीं। इस औसत की मज़ीद तस्दीक़ (पुष्टि) हमने बीस मुख़्तलिफ़ मर्सियों के उन 360 बंदों की बैतों से भी की, जिनका तज़किरा (ज़िक्र) पहले किया जा चुका है। उनके नतीजों से भी इसी बात की तौसीक़ (पुष्टि) हुई।

    पहली जिल्द 90:6

    दूसरी जिल्द 90:5

    तीसरी जिल्द 90:7

    चौथी जिल्द 90:5

    मीज़ान (कुल योग) 360:23 : औसत 6 फ़ीसद

    यानी 360 बैतों में सिर्फ़ 23 पाबंद रदीफ़ों में हैं और औसत के पेश-ए-नज़र अब इस वज़ाहत (स्पष्टीकरण) की ज़रूरत नहीं रहती कि बैतों का सौती (ध्वन्यात्मक) रुझान बंदों के सौती रुझान के बिल्कुल बरअक्स (विपरीत) है, यानी वहाँ पाबंद क़वाफ़ी (काफ़ियों) और मुसम्मते (व्यंजनों) पर ज़ोर था तो यहाँ आज़ाद क़वाफ़ी यानी मुसव्वते (स्वरों) की कसरत (अधिकता) है। गोया बिल्कुल दिन और रात की कैफ़ियत है। हर चार मिसरों के बाद जब क़ाफ़िया बदलता है तो एक ज़बरदस्त अंदरूनी मौसीक़ियत (संगीतात्मकता) और ड्रामाइयत (नाटकीयता) पैदा होती है। बंदों में शौकत, दबदबा, बुलंद-आहंगी (ऊँचा स्वर) और जलाल है तो बैतों में जमाल (सौंदर्य), रस और लताफ़त (कोमलता) है। बंदों में उठान और बयान है तो बैतों में तकमिला (पूर्णता) और ख़ात्मे की कैफ़ियत है। बंदों के मुसम्मते (व्यंजन) जब बैतों की खुली आवाज़ों और मुसव्वतों (स्वरों) में ढलते हैं तो अजब ख़ुश-आहंगी (सुरीलेपन) और जमालियाती कैफ़ (सौंदर्यात्मक आनंद) का एहसास होता है। यह है क़सीदे और ग़ज़ल की रूह का वह मिलाप जिसकी तरफ़ शुरू में इशारा किया गया था कि इसने अनीस के यहाँ एक अछूता उस्लूबियाती पैकर (शैलीगत रूप) इख़्तियार किया और फ़साहत (प्रांजलता) के क़दीम तसव्वुर (पुरानी अवधारणा) को एक नई शेरी जिहत (काव्यगत दिशा) से आश्ना किया (परिचित कराया)।

    इस सारी बहस में अब तक हमने दबीर को नज़रअंदाज़ किया है। हमारे मुक़द्दमे (दावे) पर अभी यह सवाल क़ायम किया जा सकता है कि अनीस के मर्सियों की जिस इम्तियाज़ी ख़ुसूसियत (विशिष्ट विशेषता) पर हम इसरार कर रहे हैं (ज़ोर दे रहे हैं) और जिसे अनीस की फ़साहत के मलफ़ूज़ी अज्ज़ा-ए-तरकीबी (शाब्दिक घटकों) का जुज़्व-ए-लाज़िमी (अनिवार्य हिस्सा) क़रार दे रहे हैं, वह कहीं मुसद्दस ही की ख़ुसूसियत हो। यानी क़सीदे और ग़ज़ल के हैयती अनासिर (संरचनात्मक तत्वों) की आमेज़िश (मिलावट) और मुसम्मते (व्यंजनों) और मुसव्वतों (स्वरों) का सौती टकराव (ध्वन्यात्मक टकराव) और झंकार कहीं मुसद्दस ही के फ़ॉर्म की बदौलत हो, और तमाम मुसद्दस कहने वालों में यह ख़ुसूसियत जुज़्व-ए-मुश्तरक (साझा तत्व / Common Denomination) ही की हैसियत रखती हो। इस सूरत में इसका हक़-ए-तहसीन (श्रेय / Credit) मुसद्दस की हैयत (संरचना) को मिलना चाहिए कि अनीस के फ़न (कला) को।

    चुनाँचे (इसलिए) ज़रूरी है कि इस ज़िम्न (सिलसिले) में अनीस के मुसद्दस का मुवाज़ना (तुलना) दबीर के मुसद्दस से किया जाए, क्योंकि अगर ये ख़साइस (विशेषताएँ) मुसद्दस के हैं यानी उनका वुक़ूअ (घटित होना) मुसद्दस में बिल-क़ुव्वत (अंतर्निहित / Latent) मौजूद है तो दोनों में मुश्तरक (साझा) होंगे और इस बारे में अनीस का कुछ इम्तियाज़ (विशिष्टता) होगा और अगर इनका तअल्लुक़ शायर के जौहर-ए-ज़ाती (निजी गुण) और ज़ेहन-ए-तख़्लीक़ी (रचनात्मक मस्तिष्क) से होगा तो दोनों के यहाँ इस सिलसिले में जो कुछ मा-बिहिल-इम्तियाज़ (अंतर करने वाला तत्व) होगा, वह ज़ाहिर होकर सामने जाएगा। अवध अख़बार की जिल्दों या नवल किशोरी जिल्दों की ग़ैर-मौजूदगी में शिआर-ए-दबीर मुरत्तबा (संपादित) मुहज़्ज़ब लखनवी (जिसमें दबीर के छह बेहतरीन मर्सिए शामिल हैं) और शायर-ए-आज़म मिर्ज़ा सलामत अली दबीर मुअल्लिफ़ा (संकलित) डॉक्टर अकबर हैदरी कश्मीरी से मदद ली गई, जिसमें दबीर का मर्सिया ज़र्रा है आफ़ताब दर-ए-बू-तुराब का शामिल है, इनकी मदद से दबीर के मर्सियों के तज्ज़िए (विश्लेषण) की जो कैफ़ियत सामने आई, दर्ज-ए-ज़ैल (निम्नलिखित) है,

    कुल बंद | पाबंद क़वाफ़ी वाले बंद

    ज़र्रा है आफ़ताब दर-ए-बू-तुराब का: 81 | 31

    जब माह ने नवाफ़िल-ए-शब को अदा किया: 153 | 69

    किस शेर की आमद है कि रन काँप रहा है: 132 | 38

    366 | 138 = 38 फ़ीसद

    इत्तेफ़ाक़ी तज्ज़िया (यादृच्छिक विश्लेषण) शिआर-ए-दबीर

    (हर दसवाँ सफ़्हा, कुल पंद्रह बार: 150:31 = 21 फ़ीसद, फ़ी सफ़्हा पाँच बंद)

    अब इस विश्लेषण से यह बेहद दिलचस्प और अकाट्य सच्चाई सामने आती है कि पाबंद क़वाफ़ी (तुकांत) वाले बंदों के इस्तेमाल पर दबीर को वह महारत हासिल नहीं या उनके स्वभाव को पाबंद क़वाफ़ी वाले बंदों से वह लगाव नहीं जो अनीस को है। अनीस के यहाँ पाबंद क़वाफ़ी वाले बंदों का इस्तेमाल 60 से 66 प्रतिशत यानी लगभग दो-तिहाई है, जबकि दबीर की रेंज (range) 21 प्रतिशत से 38 प्रतिशत है यानी लगभग एक-तिहाई। इसी अनुपात से दोनों की कला में दूसरे शेरी (काव्य) तत्वों के अलावा, जो बुनियादी रूपगत (बनावट का) और ध्वन्यात्मक (आवाज़ का) फ़र्क़ है, यानी पाबंद और आज़ाद क़वाफ़ी के टकराव, और आवाज़ों के बदलाव के ख़ास उतार-चढ़ाव और ध्वन्यात्मक झंकार से जो जमालियाती कैफ़ियत (सौंदर्य का एहसास) पैदा होती है, वह इसी लिहाज़ से दबीर के यहाँ कम है। दबीर के यहाँ यह ख़ूबी हालाँकि मौजूद है, लेकिन उस व्यापक और ऊँचे पैमाने पर नहीं जैसी अनीस के यहाँ है। साथ ही इससे यह सच्चाई भी सामने आती है कि पाबंद क़वाफ़ी वाले बंदों का इस्तेमाल मुसद्दस के फ़ॉर्म की ज़रूरी शर्त नहीं है, वरना दोनों के यहाँ इनका औसत कमोबेश एक जैसा होता।

    इस विश्लेषण से अनीस और दबीर की कला का फ़र्क़ (ध्वनि की हद तक) तो साफ़ तौर पर सामने गया, लेकिन जहाँ तक मुसद्दस के फ़ॉर्म का ताल्लुक़ है, अभी इसे और जाँचने की ज़रूरत है। ख़ास तौर पर मर्सिए से हटकर जिन शायरों ने मुसद्दस का इस्तेमाल किया है, उनके यहाँ भी यह देख लेना चाहिए कि मुसद्दस की क्या स्थिति मिलती है और पाबंद और आज़ाद क़वाफ़ी वाले बंदों का क्या रूप है। इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने कुछ कारणों से हाली और चकबस्त का चुनाव किया क्योंकि अनीस के बाद इन दोनों ने मुसद्दस के फ़ॉर्म को जिस कामयाबी से इस्तेमाल किया है, उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती। 'मुसद्दस-ए-हाली' चूँकि एक मुसलसल (निरंतर) नज़्म है और काफ़ी लंबी है, इसलिए बेहतर तरीक़ा यही था कि इसका रैंडम (random) विश्लेषण किया जाए। इससे जो दिलचस्प नतीजे सामने आए, वे नीचे दिए गए हैं:

    (मुसद्दस-ए-हाली सदी एडिशन, संपादक: डॉ. सैयद आबिद हुसैन, लाहौर से प्रकाशित 1957 ई.)

    पृष्ठ पाबंद क़वाफ़ी वाले बंद

    80 2

    90 1

    100 2

    110 0

    120 2

    130 1

    140 0

    150 2

    160 0

    170 1

    180 1

    185 3

    175 1

    165 2

    155 1

    कुल बंद 60 पाबंद 19: औसत 32 प्रतिशत

    हर पृष्ठ पर चार बंद हैं। इस तरह पंद्रह पृष्ठों पर कुल साठ बंद हैं। इनमें पाबंद क़वाफ़ी वाले बंद सिर्फ़ उन्नीस निकले, यानी एक-तिहाई से भी कम। यह अनीस के औसत से आधा हुआ। इस पर किसी टिप्पणी की ज़रूरत नहीं। (अलबत्ता इस कमी को हाली एक और तरह से पूरा करने की कोशिश करते हैं, यानी उनके यहाँ 60 बैतों में से 15 पाबंद हैं और जो बिल्कुल अलग बात है। अनीस के यहाँ बैतें आमतौर पर आज़ाद और खुली हुई हैं।) अब ज़रा चकबस्त को देखिए। उनके यहाँ रामायण का एक सीन से बेहतर मुसद्दस नहीं है, इसलिए इसी को लिया गया। कुल बंद 33, पाबंद क़वाफ़ी 24 और 33 बैतों में से सिवाय एक के सब आज़ाद और खुली हुईं। क्या इसके बाद यह बताने की ज़रूरत बाक़ी है कि चकबस्त का मुसद्दस अनीस के कितना क़रीब है? और चकबस्त के बारे में वह बात जो तास्सुराती (प्रभावात्मक) या जमालियाती (सौंदर्यपरक) तौर पर कही जाती है कि चकबस्त की कला अनीस से बहुत ज़्यादा प्रभावित है, उसकी कैसी साफ़ और ठोस बुनियाद इस विश्लेषण से सामने जाती है।

    साथ ही, अब इस बारे में किसी शक की गुंजाइश नहीं कि पाबंद क़वाफ़ी वाले बंदों का कोई तय प्रतिशत मुसद्दस के फ़ॉर्म के लिए ज़रूरी नहीं है। मुसद्दस का इस्तेमाल करने वाले अलग-अलग शायरों के यहाँ इसका औसत अलग-अलग है। यानी किसी ख़ास संख्या में पाबंद क़वाफ़ी वाले पहले चार मिसरों का आना मुसद्दस के फ़ॉर्म का कॉमन डिनॉमिनेटर (common denominator) नहीं है। दबीर और हाली के यहाँ इनका आना आमतौर पर एक-तिहाई है, जबकि अनीस के यहाँ दो-तिहाई। यह फ़र्क़ मामूली फ़र्क़ नहीं है और यह विशेषता मुसद्दस का इस्तेमाल करने वाले तमाम शायरों में सिर्फ़ अनीस को हासिल है। अनीस ने एक जगह क्या अच्छा इशारा किया है:

    बज़्म का रंग जुदा रज़्म का मैदां है जुदा

    ये चमन और है ज़ख़्मों का गुलिस्तां है जुदा

    फ़हम-ए-कामिल हो तो हर नामे का उनवां है जुदा

    मुख़्तसर पढ़ के रुला देने का सामां है जुदा

    दबदबा भी हो मसाइब भी हों, तौसीफ़ भी हो

    दिल भी महज़ूज़ हों, रिक्क़त भी हो, तारीफ़ भी हो

    अनीस 'बज़्म' (महफ़िल) और 'रज़्म' (युद्ध) के राज़ जानने वाले थे। बैन-ओ-बुका (रोने-पीटने) को उन्होंने मुख़्तसर पढ़ के रुला देने तक सीमित रखा है। 'मसाइब' (दुख-दर्द) और 'रिक्क़त' (भावुकता) के साथ-साथ उन्हें इस बात का ख़ास ख़याल था कि दिल भी महज़ूज़ हों (आनंदित हों), जो ग़ज़ल की ख़ूबी है, और दबदबा भी हो, तौसीफ़ (प्रशंसा) भी हो और तारीफ़ भी, जो क़सीदे का काम है। अनीस ने यह सब काम मुसद्दस से लिया। ऊपर की बहस से यह बात साबित हो जाती है कि अनीस जिस फ़साहत (भाषा की शुद्धता और मिठास) का दावा करते हैं, या शिबली और उनके बाद आने वाले आलोचक अनीस की जिस फ़साहत की दाद देते हैं, उसका गहरा ताल्लुक़ मुसद्दस के फ़ॉर्म को बेहद कलाकारी के साथ इस्तेमाल करने से भी है और ग़ज़ल और क़सीदे की शेरी (काव्य) आत्मा को जज़्ब करके उसका रूप बदलने (तक़लीब) से भी है। अनीस की फ़साहत नज़र के धोखे का सामान ज़रूर मुहैया करती है, लेकिन असल में यह वैसी फ़साहत नहीं है जिसकी कल्पना पुराने या बीच के दौर के शायरों के यहाँ मिलती है।

    अनीस ने मर्सिए के माहौल में क़सीदे की परंपरा से फ़ायदा उठाकर फ़साहत के प्रचलित अर्थ में नया विस्तार पैदा किया। मुमकिन है ऐसा अनजाने में हुआ हो, फिर भी इससे यह बात साफ़ तौर पर सामने जाती है कि अनीस ने नासिख़ियत के ही कुछ हिस्सों का रूप बदलकर नासिख़ियत से टक्कर ली। उन्होंने मर्सिए को एक नई मधुरता और जमालियाती हुस्न (सौंदर्य) देकर, परोक्ष रूप से नासिख़ियत की हार में क़सीदे के ज़ोर-ए-बयान और दबदबे को, और बैतों में ग़ज़ल की नज़ाकत और नर्मी को आपस में जोड़कर मर्सिए को जो नया शैलीगत रूप (उस्लूबियाती पैकर) दिया, वह उनकी कला की ख़ास पहचान है। और यह उस फ़साहत का अटूट हिस्सा है जिसके पुराने अर्थ को उन्होंने विस्तार दिया और जिसका असर बाद की उर्दू शायरी पर बराबर महसूस होता रहा है।

    मूल उर्दू लेख यहाँ पढ़िए :

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