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नज़्म
वापसी
ख़िज़ाँ के जाते ही रुत का पाँसा पलट गया है
बहार की ख़ुशबुओं से गुलशन का ज़र्रा ज़र्रा महक रहा है
ताज सईद
ग़ज़ल
तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़-राह-ए-लिहाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
मिरे होंटों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है



