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ग़ज़ल
दुख न पावे कहीं वो नाज़नीं-गर्दन प्यारे
तकिया ज़िन्हार सर-ए-बालिश-ए-मख़मल न करो
आफ़ताब शाह आलम सानी
ग़ज़ल
गिरफ़्तार-ए-हवस क्या लज़्ज़त-ए-दीदार कूँ पावे
जुदा जो कुई हुआ है आप सीं पाया विसाल उस का
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
तीरों में कमाँ-दार मिरा घेर ले जिस को
वो जाने न पावे कभी मैदाँ से निकल कर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
कुल्लियात
वो फ़िक्र कर कि चाक-ए-जिगर पावे इल्तियाम
नासेह जो तू ने जामा सुलाया तो क्या हुआ
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
शीशा मुझ दिल सा न पावे और तिरी आँखों सा जाम
ले अगर साक़ी हज़ारों साल मयख़ाने की अर्ज़
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
ग़ज़ल
शर्बत-ए-ख़ून-ए-जिगर का मज़ा 'आशिक़ पावे
लज़्ज़त-ए-इश्क़-ए-जिगर-ख़ार कूँ कुइ क्या जाने
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
दूर हो गर शाम्मा से तेरे ग़फ़लत का ज़ुकाम
तू उसी की बू को पावे हर गुल-ओ-सौसन के बीच
मीर मोहम्मदी बेदार
कुल्लियात
'मीर' अब भला क्या इब्तिदा-ए-इश्क़ को रोता है तू
कर फ़िक्र जो पावे भी इस आग़ाज़ के अंजाम को
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
सद-रंग जल्वा-गर है हर जादा ग़ैरत-ए-गुल
आशिक़ की एक पावे क्यूँकर क़रार ख़्वाहिश
