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ग़ज़ल
गुज़रें हमारे घर की किसी रहगुज़र से वो
पर्दे हटाएँ देखें उन्हें खिड़कियों से हम
आलोक श्रीवास्तव
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शेर
यूँ लगता है सारी दुनिया बंद है मेरी मुट्ठी में
जिस दम मेरी उंगली पकड़े मेरा बेटा चलता है
अज़ीज़ नबील
नज़्म
अदल-ए-फ़ारूक़ी का एक नमूना
तुम्हीं दे सकते हो इस का मिरी जानिब से जवाब
कि न पकड़े मुझे महशर में मिरा रब्ब-ए-ग़फ़ूर
शिबली नोमानी
ग़ज़ल
फ़क़ीह-ए-शहर को समझो कि हम पकड़े गए नाहक़
शराबें सब उसी की थीं बस इक पैमाना मेरा था
अर्श सिद्दीक़ी
नज़्म
नक़्क़ाद
लोग जिन की जाँ-गुदाज़ी से हैं दिल पकड़े हुए
खोखले नग़्मे हैं वो औज़ान में जकड़े हुए
जोश मलीहाबादी
हास्य
अजब अंदाज़ से जन्नत में वो हूरों पे झपटेंगे
मगर मुल्लाओं को पकड़े हुए मुल्लानियाँ होंगी
खालिद इरफ़ान
नज़्म
ज़रा सोचो
बिल्ली दूध का प्याला पकड़े गोश्त माँगती रहती
दिन भर लेटी दादी जैसी अपनी बात ही कहती
असना बद्र
नज़्म
एक-तरफ़ा इश्क़
मैं अपनी नज़्म से भरी डाइरी हाथ में पकड़े
तुम्हारे सामने जब भी पढ़ना चाहता हूँ












