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अभिनंदन पांडे

1988 | दिल्ली, भारत

नई पीढ़ी के अहम शायरों में शामिल

नई पीढ़ी के अहम शायरों में शामिल

ग़ज़ल 8

शेर 4

ग़ौर से देखते रहने की सज़ा पाई है

तेरी तस्वीर इन आँखों में उतर आई है

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नस्ल-ए-आदम रफ़्ता रफ़्ता ख़ुद को कर लेगी तबाह

इतनी सख़्ती से क़यामत पेश आएगी पूछ

दरमियाँ जो जिस्म का पर्दा है कैसे होगा चाक

मौत किस तरकीब से हम को मिलाएगी पूछ

चित्र शायरी 1

चलो फ़रार-ए-ख़ुदी का कोई सिला तो मिला हमीं मिले नहीं उस को हमें ख़ुदा तो मिला नशात-ए-क़र्या-ए-जाँ से जुदा हुई ख़ुश्बू सफ़र कुछ ऐसा है अब के कोई मिला तो मिला हमारे बा'द रिवायत चली मोहब्बत की निज़ाम-ए-आलम-ए-हस्ती को फ़ल्सफ़ा तो मिला जो छोड़ आए थे तस्कीन-ए-दिल के वास्ते हम तुम्हें ऐ जान-ए-तमन्ना वो नक़्श-ए-पा तो मिला सवाल आ गए आँखों से छिन के होंटों पर हमें जवाब न देने का फ़ाएदा तो मिला ये आह-ओ-गिर्या-ओ-ज़ारी कहीं तो काम आई हवा-ए-दश्त को पानी का ज़ाइक़ा तो मिला नमाज़-ए-अस्र नहीं पढ़ सकी मिरी वहशत जुनून-ए-इश्क़ को मैदान-ए-कर्बला तो मिला फिर इस के बा'द बरामद न हो सका कुछ भी हमारे आँख में जलता हुआ दिया तो मिला

 

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