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अब्बास क़मर

1994 | दिल्ली, भारत

नई पीढ़ी के शायरों में शामिल

नई पीढ़ी के शायरों में शामिल

ग़ज़ल 5

 

नज़्म 1

 

शेर 7

मेरे कमरे में उदासी है क़यामत की मगर

एक तस्वीर पुरानी सी हँसा करती है

अश्कों को आरज़ू-ए-रिहाई है रोइए

आँखों की अब इसी में भलाई है रोइए

उन्हें आँखों ने बेदर्दी से बे-घर कर दिया है

ये आँसू क़हक़हा बनने की कोशिश कर रहे थे

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