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पल्लव मिश्रा

1998 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 11

शेर 13

शहर-ए-जाँ में वबाओं का इक दौर था

मैं अदा-ए-तनफ़्फ़ुस में कमज़ोर था

ये तय हुआ था कि ख़ूब रोएँगे जब मिलेंगे

अब उस के शाने पे सर है तो हँसते जा रहे हैं

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वो नशा है के ज़बाँ अक़्ल से करती है फ़रेब

तू मिरी बात के मफ़्हूम पे जाता है कहाँ

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तिरे लबों में मिरे यार ज़ाइक़ा नहीं है

हज़ार बोसे हैं उन पर इक दुआ नहीं है

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मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था

सो तेरे घर के क़रीब कर भटक रहा हूँ

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पुस्तकें 1

Shumara Number-029

2018

 

चित्र शायरी 1

तुम्हारी दुनिया के बाहर अंदर भटक रहा हूँ मैं बा'द-ए-तर्क-ए-जहाँ यही पर भटक रहा हूँ मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था सो तेरे घर के क़रीब आ के भटक रहा हूँ मैं एक ख़ाना-ब-दोश हूँ जिस का घर है दुनिया सो अपने काँधों पे ले के ये घर भटक रहा हूँ मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला भटकने वालों से काफ़ी बेहतर भटक रहा हूँ

 

वीडियो 5

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

पल्लव मिश्रा

कुछ ऐसे दो-जहाँ से राब्ता रक्खा गया है

पल्लव मिश्रा

तुम्हारी दुनिया के बाहर अंदर भटक रहा हूँ

पल्लव मिश्रा

लहू में घुल घुल के बह रहे थे रगों के अंदर

पल्लव मिश्रा

वो बार-ए-फ़र्ज़-ए-तकल्लुफ मुझी को धोना पड़ा

पल्लव मिश्रा

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