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विपुल कुमार

1993 | गुड़गाँव, भारत

ग़ज़ल 8

शेर 20

इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए

और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए

हर मुलाक़ात पे सीने से लगाने वाले

कितने प्यारे हैं मुझे छोड़ के जाने वाले

उस हिज्र पे तोहमत कि जिसे वस्ल की ज़िद हो

उस दर्द पे ला'नत की जो अशआ'र में जाए

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