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आशू मिश्रा

1993 | बरेली, भारत

चित्र शायरी 1

कोई आ कर नहीं जाता दिलों के आशियानों से रिहाई का कोई रस्ता नहीं इन क़ैद-ख़ानों से मछेरे कश्तियों में बैठ कर के गा रहे हैं गीत हवाएँ मुस्कुरा कर मिल रही हैं बादबानों से ज़मीं वालों ने जब से आसमाँ की ओर देखा है परिंदे ख़ौफ़ खाने लग गए ऊँची उड़ानों से ये सूखे ज़ख़्म हैं या रंग हैं तस्वीर माज़ी के मुझे गुज़रे ज़माने याद आए इन निशानों से हमें अपनी लड़ाई इस ज़मीं पर ख़ुद ही लड़नी है फ़रिश्ते तो नहीं आने यहाँ पर आसमानों से तुम्हारा दिल यहाँ पर खो गया तो कैसी हैरत है बरेली में तो झुमके तक निकल जाते हैं कानों से

 

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