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ज़ीशान साहिल

1961 - 2008 | कराची, पाकिस्तान

प्रमुख उत्तर-आधुनिक शायर/अपनी नज़्मों के लिए मशहूर

प्रमुख उत्तर-आधुनिक शायर/अपनी नज़्मों के लिए मशहूर

ग़ज़ल 14

शेर 13

किस क़दर महदूद कर देता है ग़म इंसान को

ख़त्म कर देता है हर उम्मीद हर इम्कान को

मैं ज़िंदगी के सभी ग़म भुलाए बैठा हूँ

तुम्हारे इश्क़ से कितनी मुझे सहूलत है

गुज़र गई है मगर रोज़ याद आती है

वो एक शाम जिसे भूलने की हसरत है

जो हमें पा के भी खोने से बहुत पीछे था

हम उसे खो के भी पाने से बहुत आगे हैं

कितने हैं लोग ख़ुद को जो खो कर उदास हैं

और कितने अपने-आप को पा कर भी ख़ुश नहीं

पुस्तकें 3

सारी नज़्में

 

2011

वजहे बेगानगी

 

2012

Naya Waraq,Mumbai

Shumara Number-029

2008

 

चित्र शायरी 4

किस क़दर महदूद कर देता है ग़म इंसान को ख़त्म कर देता है हर उम्मीद हर इम्कान को गीत गाता भी नहीं घर को सजाता भी नहीं और बदलता भी नहीं वो साज़ को सामान को इतने बरसों की रियाज़त से जो क़ाएम हो सका आप से ख़तरा बहुत है मेरे इस ईमान को कोई रुकता ही नहीं इस की तसल्ली के लिए देखता रहता है दिल हर अजनबी मेहमान को अब तो ये शायद किसी भी काम आ सकता नहीं आप ही ले जाइए मेरे दिल-ए-नादान को शहर वालों को तो जैसे कुछ पता चलता नहीं रोकता रहता है साहिल रोज़-ओ-शब तूफ़ान को

 

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