ग़ज़ल 32

नज़्म 28

शेर 12

शाम को तेरा हँस कर मिलना

दिन भर की उजरत होती है

लड़कियाँ माओं जैसे मुक़द्दर क्यूँ रखती हैं

तन सहरा और आँख समुंदर क्यूँ रखती हैं

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अकेले घर में भरी दोपहर का सन्नाटा

वही सुकून वही उम्र भर का सन्नाटा

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ई-पुस्तक 1

Kunj Peele Phoolon Ka

 

1986

 

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