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नईम जर्रार अहमद

1965 | लाहौर, पाकिस्तान

ग़ज़ल 20

शेर 9

मैं वो महरूम-ए-इनायत हूँ कि जिस ने तुझ से

मिलना चाहा तो बिछड़ने की वबा फूट पड़ी

जितनी आँखें थीं सारी मेरी थीं

जितने मंज़र थे सब तुम्हारे थे

एक मंज़िल है मुख़्तलिफ़ राहें

रंग हैं बे-शुमार फूलों के

ये जानता है पलट कर उसे नहीं आना

वो अपनी ज़ीस्त की खिंचती हुई कमान में है

इश्क़ वो चार सू सफ़र है जहाँ

कोई भी रास्ता नहीं रुकता

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